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Mohan Bhagwat Speech: आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने केन्या का किस्सा साझा करते हुए बताया कि वहां के छात्रों को उन्होंने स्वयं तीन क्लास लेकर धोती बांधना सिखाया. उन्होंने मणिपुर की वेशभूषा और भारतीय महापुरुषों के चित्रों को घरों में लगाने पर जोर दिया. भागवत के अनुसार भाषा, भूषा, भजन, भवन और भोजन ही हमारी असली पहचान हैं. उन्होंने युवाओं से विदेशी चकाचौंध के बजाय चित्तौड़गढ़ और रायगढ़ जैसे ऐतिहासिक स्थलों का भ्रमण करने का आह्वान किया.

मोहन भागवत ने दिलचस्प किस्सा लोगों को सुनाया.
मुंबई: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने आरएसएस के 100 साल पूरे होने के उपलक्ष में मुंबई में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान अपनी विदेश यात्रा का एक दिलचस्प अनुभव साझा किया. उन्होंने बताया कि कैसे केन्या के छात्रों ने अपनी जड़ों से जुड़ने के लिए विदेशी धरती पर भारतीय वेशभूषा को अपनाया. भागवत ने इस बात पर जोर दिया कि अपनी संस्कृति और पहनावे (भूषा) का गौरव ही व्यक्ति और राष्ट्र की असली पहचान होती है. उन्होंने युवाओं से अपनी भाषा, भजन और भोजन के प्रति स्वाभिमानी बनने का आह्वान किया.
विदेशी चकाचौंध के बीच जब अपनी मिट्टी की खुशबू महकती है, तो वह दृश्य न केवल गौरवशाली होता है बल्कि आत्म-चिंतन की प्रेरणा भी देता है. मोहन भागवत ने केन्या का एक ऐसा ही प्रसंग सुनाया, जिसने यह साबित कर दिया कि भारतीय वेशभूषा का आकर्षण सीमाओं से परे है. उन्होंने बताया कि कैसे केन्या में मौजूद भारतीय मूल के छात्रों ने एक समारोह के लिए पारंपरिक धोती-कुर्ता पहनने का मन बनाया. चुनौती यह थी कि किसी को धोती बांधना नहीं आता था लेकिन अपनी संस्कृति के प्रति उनका समर्पण इतना गहरा था कि खुद सरसंघचालक को इसके लिए विशेष कक्षाएं लेनी पड़ीं. तीन क्लासेस के माध्यम से जब उन छात्रों ने धोती पहनना सीखा, तो वह केवल एक पहनावा नहीं बल्कि अपनी पहचान को सहेजने का संकल्प था.
मणिपुर का जिक्र
भागवत का यह अनुभव आज के उस दौर में एक कड़ा संदेश है, जहां लोग आधुनिकता की दौड़ में अपने पारंपरिक संस्कारों और वेशभूषा को ‘आउटडेटेड’ समझने की भूल कर बैठते हैं. डॉ. भागवत ने अपने संबोधन में मणिपुर के सामाजिक परिवेश की भी सराहना की. उन्होंने कहा कि मणिपुर में व्यक्ति का दर्जा चाहे जो भी हो, वह सामाजिक भोज या त्यौहारों में पारंपरिक वेशभूषा पहनना अनिवार्य समझता है. उन्होंने अफसोस जताया कि हम अपनी
घर में माइकल जेक्सन की तस्वीर क्यों?
गौरवपूर्ण पहचान को छोटी-छोटी कुरीतियों के कारण छोड़ते जा रहे हैं. भागवत के अनुसार, ‘भाषा, भूषा, भजन, भवन और भोजन’ ये पांच तत्व समाज के ‘स्व’ का आधार होते हैं. बच्चों के विकास पर चर्चा करते हुए उन्होंने घरों की सजावट पर भी सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि बच्चों के कमरों में माइकल जैक्सन के बजाय स्वामी विवेकानंद, तिलक, सावरकर और अंबेडकर जैसे महापुरुषों के चित्र होने चाहिए. इससे बच्चों में अपने इतिहास और नायकों के प्रति स्वाभाविक परिचय विकसित होता है. उन्होंने सात्विक भोजन पर जोर देते हुए कहा कि कभी-कभार बाहर खाना ठीक है, लेकिन इसे आदत नहीं बनाना चाहिए.
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पत्रकारिता में 14 साल से भी लंबे वक्त से सक्रिय हूं. साल 2010 में दैनिक भास्कर अखबार से करियर की शुरुआत करने के बाद नई दुनिया, दैनिक जागरण और पंजाब केसरी में एक रिपोर्टर के तौर पर काम किया. इस दौरान क्राइम और…और पढ़ें

