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Sarojini Naidu News: सरोजिनी नायडू कवयित्री भी थीं. इन्होंने वीर रस के गीतों के जरिए देश के जनमानस को आजादी की लड़ाई में भाग लेने के लिए प्रेरित किया था और जब भारत आजाद हुआ था तो संविधान सभा के सभी सदस्यों को राष्ट्रीय ध्वज के तले खड़े होने के लिए प्रेरित किया. सरोजिनी नायडू इस बात का आदर्श उदाहरण हैं कि नारी कमजोर नहीं, सबल है और सक्षम है. उनके हित और हक बराबर हैं. महिला अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर उनका नजरिया सटीक और साफ था.

सरोजिनी नायडू का जन्म 13 फरवरी 1879 को हैदराबाद में हुआ था.
नई दिल्ली. आज 13 फरवरी है, यानी ‘नेशनल वुमन डे’ (National Women’s Day). यह दिन किसी और का नहीं, बल्कि भारत की उस बेटी का है जिसने गुलाम भारत में महिलाओं को घूंघट से निकालकर क्रांति की मशाल थमा दी थी. हम बात कर रहे हैं सरोजिनी नायडू (Sarojini Naidu) की. जिन्हें दुनिया सिर्फ ‘भारत कोकिला’ (Nightingale of India) के नाम से जानती है, लेकिन हकीकत में वे आजादी की वो आग थीं, जिनसे अंग्रेज भी खौफ खाते थे. 13 फरवरी 1879 को हैदराबाद में जन्मीं सरोजिनी ने साबित किया कि कलम और क्रांति दोनों एक साथ चल सकती हैं.
सरोजिनी नायडू की देशभक्ति का एक किस्सा रोंगटे खड़े कर देने वाला है. एक बार बर्लिन में 42 देशों का सम्मेलन हो रहा था. वहां सभी देशों के झंडे फहराए जाने थे, लेकिन भारत का कोई आधिकारिक झंडा नहीं था. सरोजिनी नायडू को यह अपमान बर्दाश्त नहीं हुआ. उन्होंने 22 जुलाई 1947 को संविधान सभा में बताया था कि उस वक्त उन्होंने और अन्य भारतीय महिलाओं ने अपनी साड़ियों की पट्टियां फाड़कर तिरंगा बनाया, ताकि दुनिया के सामने भारत का सिर न झुके. यह उनका साहस था जिसने देश की लाज रखी.
कविताएं छोड़ कूदीं आग के दरिया में
सरोजिनी नायडू ने ‘द गोल्डन थ्रेशोल्ड’ (1905) और ‘द बर्ड ऑफ टाइम’ (1912) जैसी शानदार रचनाएं दीं. महात्मा गांधी ने उनकी लेखनी और भावनाओं के ज्वार को देखकर ही उन्हें ‘नाइटिंगेल ऑफ इंडिया’ कहा था. लेकिन 1917 के बाद उन्होंने अपनी कलम को कुछ समय के लिए विराम दे दिया. वजह थी- मातृभूमि की पुकार. वे ‘द ब्रोकन विंग्स’ के बाद पूरी तरह स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़ीं. 1920 के असहयोग आंदोलन में उन्होंने सैकड़ों सभाओं में दहाड़ लगाई. वे 1925 में कांग्रेस की अध्यक्ष बनने वाली पहली भारतीय महिला बनीं और आजादी के बाद यूपी की पहली महिला राज्यपाल भी.
पर्दा प्रथा और बाल विवाह पर करारा प्रहार
उस दौर में जब महिलाओं का घर से निकलना मुश्किल था, सरोजिनी नायडू ने पर्दा प्रथा और बाल विवाह जैसी कुरीतियों के खिलाफ जंग छेड़ी. उन्होंने विधवा पुनर्विवाह और उनकी शिक्षा के लिए समाज से लोहा लिया. लंदन में पढ़ाई के दौरान ही उन्होंने महिलाओं के वोटिंग राइट्स के लिए आवाज उठाई थी. भारत आकर उन्होंने एनी बेसेंट के साथ मिलकर ‘वुमन इंडियन एसोसिएशन’ की नींव रखी. उनका साफ कहना था- “देश सेवा और चेतना में लैंगिक भेदभाव (Gender Discrimination) नहीं होना चाहिए.”
दुनिया ने माना लोहा
सरोजिनी नायडू सिर्फ भारत तक सीमित नहीं थीं. 1924 में वे पूर्वी अफ्रीकी भारतीय कांग्रेस में शामिल हुईं और 1928-29 में अमेरिका जाकर भारत की आजादी के लिए समर्थन जुटाया. ब्रिटिश हुकूमत ने उन्हें कई बार जेल में डाला, लेकिन उनके हौसले को कोई सलाखें नहीं रोक सकीं. आज का दिन उन्हीं के जज्बे को सलाम करने का दिन है.
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राकेश रंजन कुमार को डिजिटल पत्रकारिता में 10 साल से अधिक का अनुभव है. न्यूज़18 के साथ जुड़ने से पहले उन्होंने लाइव हिन्दुस्तान, दैनिक जागरण, ज़ी न्यूज़, जनसत्ता और दैनिक भास्कर में काम किया है. वर्तमान में वह h…और पढ़ें

