पटना. बिहार की राजनीति को वर्तमान दौर में समझिए और विपक्ष में कोई खास चेहरे की बात अगर करिए तो निश्चित तौर पर राजद के कार्यकारी अध्यक्ष तेजस्वी प्रसाद यादव का नाम ही नजर में आएगा. लेकिन, इसके साथ सवाल यह भी कि क्या वास्तव में वह विपक्ष के प्रमुख चेहरा हैं. इस सवाल का जवाब समझने के लिए बीते वर्ष 14 नवंबर को बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजे के बाद की स्थितियों से आकलन करना होगा. इन तीन महीनों के भीतर कुछ मुद्दे ऐसे उभरे जिस पर बिहार में विपक्ष के चेहरे को लेकर बड़ी बहस चढ़ गई है. यह विमर्श तब और चर्चा में आ गया जब पटना के शंभू गर्ल्स हॉस्टल मामले में मुखर आवाज बन चुके पूर्णिया के निर्दलीय सांसद पप्पू यादव एक पुराने केस के मामले में गिरफ्तार किए गए. सामान्य जनमान और राजनीतिज्ञों से लेकर राजनीतिक चिंतकों के बीच में पप्पू यादव की गिरफ्तारी को लेकर कई सवाल उठे. बड़े अपराधों की तुलना में अपेक्षाकृत सामान्य और 31 साल पुराने मामले में उन पर कोर्ट के आदेश पर पुलिस की कार्रवाई हुई और वह गिरफ्तार किए गए. लेकिन, जानकारों की नजर में उनकी गिरफ्तारी और जमानत पर रिहाई के बीच चार-पांच दिनों के प्रकरण में वह फिर से एक चेहरे के तौर पर सामने आते हुए प्रतीत हो रहे. दरअसल, राजनीतिक जानकारों की नजर में इस दौरान कुछ ऐसा हुआ है जो पप्पू यादव के लिए विपक्ष के बाजीगर के तौर पर उभरकर सामने आए हैं.
गिरफ्तारी ने बदल दी सियासी दिशा
नीट छात्रा मामला बना टर्निंग प्वाइंट
आवाज बुलंद करने की शुरुआत तो प्रशांत किशोर ने की थी, लेकिन पप्पू यादव ने उस मुद्दे को अपने पक्ष में कैश कर लिया और लोगों की सहानुभूति भी बटोरते दिखे. जब उनकी गिरफ्तारी हुई तो लगातार सवाल उठाने उठने लगे कि आखिर पप्पू यादव को इसी मुखर आवाज का दंड सरकार ने दिया है. जाहिर तौर पर जनता के मन में पप्पू यादव के लिए एक सहानुभूति विकसित हुई जो राजनीति की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है. खास तौर पर तब जब विपक्ष का सबसे बड़ा चेहरा तेजस्वी यादव अधिक सक्रिय नहीं दिखे.
राहुल-प्रियंका की सक्रियता ने बदली तस्वीर
दूसरी ओर, इस पूरे मामले को राजनीतिक घटनाक्रम से जोड़कर देखिये तो पप्पू यादव की गिरफ्तारी के बाद कांग्रेस उनकी गिरफ्तारी के बाद राहुल गांधी का समर्थन जताना, फिर प्रियंका गांधी का उनके सपोर्ट में आना और इसके बाद पप्पू यादव के लिए कांग्रेस के नेताओं का बिहार के अमूमन सभी जिलों में प्रदर्शन करना, नई तरह की राजनीति की ओर संकेत करता है. खास तौर पर तब यह और भी महत्वपूर्ण हो जाता है जब यह मामला उस राजनीति से जुड़ता है जिसमें ने पप्पू यादव अब तक कांग्रेस में एक तरह से अलग-थलग ही दिखते रहे हैं.
राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के एकसाथ समर्थन से पप्पू यादव का कद बढ़ता हुआ प्रतीत हो रहा (PTI)
पप्पू यादव को कांग्रेस का खुल्लमखुल्ला समर्थन!
निश्चित तौर पर उसे पप्पू यादव के लिए यह बेहतरीन अवसर बनकर आया, क्योंकि जहां कांग्रेस में ही वह एक समय तक विरोध का सामना कर रहे थे और उपेक्षा की राजनीति से पीड़ित भी थे, अब राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के समर्थन से वह कांग्रेस में भी स्थापित होते दिखने लगे हैं. यहां यह भी बता दें कि पप्पू यादव अभी भी कांग्रेस के नेता के तौर पर नहीं जाने जाते हैं, बावजूद इसके कांग्रेस के कार्यकर्ताओं का पप्पू यादव के लिए प्रदर्शन करना और उनको समर्थन देना, यह पप्पू यादव की राजनीति के लिए बड़ी उपलब्धि कही जा सकती है.
पप्पू यादव पर राजद की नरमी या नई रणनीति?
सहानुभूति की लहर या राजनीतिक अवसर?
हाल के दिनों में तेजस्वी यादव के मुकाबले कई मुद्दों पर पप्पू यादव अधिक मुखर होकर सामने आए हैं.
दिल्ली में नई राजनीतिक चाल की तैयारी!
राजनीति की नई बहस-विपक्ष का चेहरा कौन?
पूरे घटनाक्रम को जोड़कर देखें तो यह सिर्फ एक गिरफ्तारी की कहानी नहीं है. यह बिहार की विपक्षी राजनीति में संभावित पुनर्संतुलन की कहानी है. कांग्रेस का समर्थन, राजद की नरमी और जनता की सहानुभूति ने पप्पू यादव को अचानक एक बड़े खिलाड़ी के रूप में स्थापित कर दिया है. अब सवाल यही है कि क्या यह लहर स्थायी होगी या फिर राजनीति की अगली चाल तस्वीर बदल देगी. राजनीति के जानकार कहते हैं कि इस पूरे प्रकरण को अगर आप गहराई से देखेंगे तो पप्पू यादव विपक्ष के नेता के तौर पर बड़े बाजीगर बनकर निकले हैं.

