वेटिकन के गलियारों में क्या अब किसी भारतीय नाम की गूंज सुनाई देगी? यह सवाल इसलिए उठ रहा है क्योंकि हैदराबाद के आर्चबिशप कार्डिनल पूला एंथोनी को ‘कैथोलिक बिशप्स कॉन्फ्रेंस ऑफ इंडिया’ (CBCI) का नया अध्यक्ष चुना गया है. भारत के पहले दलित कार्डिनल होने के नाते उनका आगे बढ़ना केवल एक पदोन्नति नहीं बल्कि वैश्विक चर्च की राजनीति में एक बड़े बदलाव का संकेत है. जब चर्च हाशिए पर रहने वाले समुदायों को मुख्यधारा में लाने की बात करता है तो 64 वर्षीय पूला एंथोनी उस बदलाव का सबसे सशक्त चेहरा बनकर उभरते हैं. दुनिया भर के कैथोलिकों की नजरें अब इस बात पर टिकी हैं कि क्या भारत का यह बेटा भविष्य में पोप की सफेद टोपी पहनकर वेटिकन की कमान संभाल सकता है?
पोप बनने की कितनी है संभावना?
कैथोलिक चर्च के इतिहास में पोप का चुनाव ‘कॉन्क्लेव’ के जरिए होता है, जहां दुनिया भर के कार्डिनल मतदान करते हैं. कार्डिनल पूला एंथोनी के पक्ष में तीन बड़ी बातें जाती हैं:
1. हाशिए की आवाज: वर्तमान पोप फ्रांसिस हमेशा ‘हाशिए के लोगों’ (Peripheries) को प्राथमिकता देते हैं. पूला एंथोनी भारत के पहले दलित कार्डिनल हैं जो वेटिकन के समावेशी एजेंडे में पूरी तरह फिट बैठते हैं.
2. प्रशासनिक अनुभव: CBCI के अध्यक्ष के रूप में वे अब भारत के करीब 2 करोड़ कैथोलिकों का नेतृत्व कर रहे हैं. उनके पास दशकों का प्रशासनिक और अंतरराष्ट्रीय अनुभव (अमेरिका में उच्च शिक्षा और सेवा) है.
3. उम्र का फैक्टर: 64 वर्ष की आयु चर्च की राजनीति में युवा मानी जाती है. उनके पास वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान पुख्ता करने के लिए पर्याप्त समय है.
चुनौती: हालांकि ऐतिहासिक रूप से पोप का पद यूरोपीय या लैटिन अमेरिकी कार्डिनल्स के पास रहा है. एशिया से अब तक कोई पोप नहीं बना है लेकिन चर्च का केंद्र अब तेजी से ग्लोबल साउथ की ओर खिसक रहा है जो भारत के लिए उम्मीद की किरण है.
पोप बनने को लेकर चुनौतियां
· ऐतिहासिक और भौगोलिक परंपरा: कैथोलिक चर्च के 2000 साल के इतिहास में अभी तक कोई भी एशियाई पोप नहीं बना है. अधिकांश पोप यूरोपीय (विशेषकर इटली) या हाल ही में लैटिन अमेरिकी मूल के रहे हैं. वेटिकन की राजनीति में यूरोपीय कार्डिनल्स का दबदबा आज भी एक बड़ा अवरोध है.
· भारतीय चर्च की आंतरिक चुनौतियां: रिपोर्ट्स के मुताबिक भारत में चर्च इस समय ‘गंभीर संकट’ और उत्पीड़न जैसी स्थितियों का सामना कर रहा है. वेटिकन अक्सर ऐसे क्षेत्रों के नेतृत्व को वैश्विक जिम्मेदारी देने से पहले वहां की स्थानीय स्थिरता को प्राथमिकता देता है.
· भाषाई और कूटनीतिक प्रभाव: पोप का पद केवल धार्मिक नहीं, बल्कि एक राजनयिक पद भी है. वेटिकन की आधिकारिक भाषाएं इटली, लैटिन, फ्रांसीसी) और यूरोपीय कूटनीति में गहरी पैठ न होना एशियाई कार्डिनल्स के लिए अक्सर एक कमजोर कड़ी साबित होता है.
· वोटिंग ब्लॉक (कॉन्क्लेव): पोप का चुनाव करने वाले कार्डिनल्स के समूह (College of Cardinals) में यूरोप और अमेरिका के कार्डिनल्स की संख्या बहुत अधिक है. एक भारतीय कार्डिनल के लिए इस विशाल पश्चिमी ब्लॉक का समर्थन हासिल करना एक कठिन चुनावी गणित है.
सवाल-जवाब
कार्डिनल पूला एंथोनी की नई भूमिका क्या है?
उन्हें शनिवार को CBCI की 37वीं जनरल बॉडी मीटिंग में ‘कैथोलिक बिशप्स कॉन्फ्रेंस ऑफ इंडिया’ का नया अध्यक्ष चुना गया है.
कार्डिनल पूला एंथोनी के चयन को ऐतिहासिक क्यों माना जा रहा है?
वे भारत के पहले दलित प्रीलेट (धर्मगुरु) हैं जो इस सर्वोच्च पद तक पहुंचे हैं और देश के लगभग 2 करोड़ कैथोलिकों का नेतृत्व करेंगे.
कार्डिनल पूला एंथोनी का शैक्षणिक और शुरुआती बैकग्राउंड क्या है?
उनका जन्म 15 नवंबर 1961 को आंध्र प्रदेश के कुरनूल में हुआ था. उन्होंने अमेरिका की लोयोला यूनिवर्सिटी से थियोलॉजी और पास्टोरल केयर में मास्टर्स डिग्री हासिल की है.
क्या CBCI का अध्यक्ष बनना पोप बनने की पहली सीढ़ी है?
यह उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान तो दिलाता है, लेकिन पोप बनने के लिए “कार्डिनल” होना अनिवार्य है, जो वे पहले से हैं. CBCI पद उनके प्रशासनिक कौशल को परखने का एक मंच मात्र है.
कार्डिनल पूला एंथोनी से पहले इस पद पर कौन था?
कार्डिनल पूला एंथोनी से पहले केरल के आर्चबिशप एंड्रयूज थझाथ CBCI के अध्यक्ष थे.

