खेजड़ी के पेड़ों को बचाने के लिए राजस्थान में जो आंदोलन हुआ, उसने एक बार फिर बिश्नोई समाज को चर्चा में ला दिया है. पश्चिमी राजस्थानी इलाके के बिश्नोई समाज के लोग अपनी अबूझ मान्यताओं के लिए जाने जाते हैं. जिनमें इनका पशुओं के प्रति प्रेम, जंगल और जमीन को जी-जान से भी ज्यादा चाहना शामिल है. बिश्नोई समाज पुराने जमाने के प्रकृति पूजक समाज की परंपरा को मानने वालों में से रहा है. चर्चित काला हिरण चिंकारा केस बिश्नोई समाज से ही जुड़ा हुआ रहा था. बिश्नोई समाज इतना अनूठा क्यों है, उनकी खास मान्यताओं पर डालते हैं नजर…
बिश्नोई समाज भारत का ऐसा धार्मिक और सामाजिक समुदाय है, जिसकी पहचान केवल पूजा-पाठ या परंपराओं से नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ सहजीवन से होती है. यह समाज खुद को इंसान से पहले पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों और पर्यावरण का संरक्षक मानता है. आज जब पर्यावरण संरक्षण को आधुनिक चर्चा के तौर पर देखा जाता है, बिश्नोई समाज सदियों पहले ही इसे अपने जीवन का मूल सिद्धांत बना चुका था.
कब हुई थी इस समाज की स्थापना
बिश्नोई समाज की स्थापना 15वीं सदी में गुरु जाम्भेश्वर, जिन्हें जाम्भोजी भी कहा जाता है, ने की थी. उस दौर में पश्चिमी राजस्थान का थार क्षेत्र भयंकर सूखे, अकाल और प्राकृतिक असंतुलन से जूझ रहा था. ऐसे समय में गुरु जाम्भेश्वर ने एक ऐसी जीवन पद्धति दी, जो प्रकृति को नुकसान पहुंचाए बिना मानव जीवन को सुरक्षित रख सके. उन्होंने जीवन के 29 नियम बनाए, जिन्हें ‘नीम’ या ‘नियम’ कहा जाता है. इन्हीं 29 नियमों के कारण इस समाज को ‘बिश्नोई’ कहा गया—बीस (20) और नौ (9), यानी 29.

इन 29 नियमों का केंद्र पर्यावरण संरक्षण है. बिश्नोई मान्यता के अनुसार किसी भी जीव की हत्या पाप है. खास तौर पर काले हिरण और चिंकारा जैसे वन्य जीवों की रक्षा को धार्मिक कर्तव्य माना गया है. हरे पेड़ों को काटना सख्त मना है, खासकर खेजड़ी वृक्ष को. खेजड़ी को रेगिस्तान की जीवनरेखा माना जाता है, क्योंकि यह पेड़ सूखे में भी हरियाली, छांव, चारा और भोजन देता है. बिश्नोई समाज के लिए खेजड़ी सिर्फ एक पेड़ नहीं, बल्कि जीता-जागता देवता है.
शुद्धता और संयम का खास है महत्व
बिश्नोई मान्यताओं में शुद्धता और संयम का खास महत्व है. समाज में कठोर शाकाहार का पालन किया जाता है. मांस, मछली, अंडा तो दूर, किसी भी प्रकार के नशीले पदार्थ—शराब, तंबाकू, अफीम—का सेवन पूरी तरह निषिद्ध है. पानी और दूध को छानकर पीने की परंपरा भी इसी सोच से जुड़ी है, ताकि सूक्ष्म जीवों की हत्या न हो. यह नियम दर्शाता है कि बिश्नोई दर्शन केवल बड़े जीवों की नहीं, बल्कि जीवन के हर रूप की रक्षा की बात करता है.
व्यक्तिगत और सामाजिक आचरण को लेकर भी बिश्नोई समाज की मान्यताएं बेहद सख्त और स्पष्ट हैं. रोज़ स्नान करना, स्वच्छ कपड़े पहनना, सादा जीवन जीना, ईमानदारी से कमाई करना, चोरी और झूठ से दूरी बनाए रखना—ये सभी नियम जीवन में अनुशासन और पवित्रता बनाए रखने के लिए हैं. बाहरी स्वच्छता के साथ-साथ आंतरिक शुद्धता पर भी ज़ोर दिया जाता है, ताकि व्यक्ति का आचरण और सोच दोनों संतुलित रहें.
भगवान विष्णु के उपासक हैं बिश्नोई समाज के लोग
धार्मिक रूप से बिश्नोई समाज भगवान विष्णु की उपासना करता है. गुरु जाम्भेश्वर को विष्णु का अवतार माना जाता है. समाज में प्रतिदिन हवन करने और अमावस्या के दिन उपवास रखने की परंपरा है. इन धार्मिक अनुष्ठानों का उद्देश्य केवल पूजा नहीं, बल्कि आत्मसंयम, प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और जीवन के प्रति जिम्मेदारी का भाव पैदा करना है.

जब 1730 में खेजड़ी बचाने के लिए दे दी थी 363 लोगों ने जान
बिश्नोई समाज को दुनिया के पहले पर्यावरण योद्धाओं में गिना जाता है. इसका सबसे बड़ा उदाहरण 1730 का खेजड़ली कांड है, जब जोधपुर के शासक के सैनिक खेजड़ी के पेड़ काटने पहुंचे. तब अमृता देवी बिश्नोई और उनके साथ 363 लोगों ने पेड़ों से चिपककर अपने प्राणों की आहुति दे दी. उनका कथन—“सिर साठे रुख रहे तो भी सस्ता जान”—आज भी बिश्नोई समाज का मूल मंत्र है. यह घटना भारतीय पर्यावरण इतिहास में बलिदान की सबसे बड़ी मिसाल मानी जाती है.
प्रकृति के प्रति करुणा बिश्नोई जीवन का अभिन्न हिस्सा है. घायल या अनाथ पशुओं की सेवा करना, हिरण के बच्चों को पालना, उन्हें दूध पिलाना—ये सब इस समाज में आम बात है. पशु-पक्षियों को समाज का सदस्य माना जाता है, न कि सिर्फ संसाधन.
आज भी सुरक्षित हैं मूल मान्यताएं
आज बिश्नोई समाज मुख्य रूप से राजस्थान, हरियाणा और पंजाब में रहता है. आधुनिकता और विकास के दबावों के बावजूद इस समाज ने अपनी मूल मान्यताओं को काफी हद तक सुरक्षित रखा है. जब भी पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाली योजनाएं सामने आती हैं, बिश्नोई समाज सबसे पहले प्रतिरोध में खड़ा दिखाई देता है.
कुल मिलाकर, बिश्नोई समाज सिर्फ एक धार्मिक समुदाय नहीं, बल्कि एक जीवंत पर्यावरण दर्शन है. उनकी मान्यताएं यह सिखाती हैं कि प्रकृति से लड़कर नहीं, उसके साथ मिलकर ही मानव सभ्यता का भविष्य सुरक्षित रह सकता है.
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