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भारत की आजादी में जमीयत का क्या योगदान, जिन्ना के पाकिस्तान पर क्या थी राय? CM रेवंत रेड्डी के दावे का जानें सच


तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी के एक बयान ने देश की राजनीति और इतिहास से जुड़ी बहस को फिर से तेज कर दिया है. हैदराबाद में जमीयत उलमा-ए-हिंद के एक कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि बोलते हुए रेवंत रेड्डी ने कहा कि भारत की आजादी में केवल कांग्रेस ही नहीं, बल्कि जमीयत उलमा-ए-हिंद का भी अहम योगदान रहा है और इसके लिए संगठन को धन्यवाद दिया जाना चाहिए.

सीएम रेवंत रेड्डी ने कहा, ‘देश की आजादी के लिए कांग्रेस ने 100 साल से ज्यादा मेहनत की है. कांग्रेस के साथ-साथ और किसी की हमें तारीफ करने का मौका मिले तो जमीयत उलेमा की तारीफ करना जरूरी है. देश की आजादी में कांग्रेस के साथ जमीयत उलेमा भी हकदार है. रेड्डी के इस बयान पर सियासत भी शुरू हो गई और बीजेपी ने इसे मुस्लिम तुष्टीकरण का उदाहरण बताते हुए कांग्रेस सरकार को घेरा है.

मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी के इस बयान के बाद यह सवाल फिर उठ खड़ा हुआ है कि आखिर भारत के स्वतंत्रता संग्राम में जमीयत उलमा-ए-हिंद की भूमिका क्या थी? क्या वाकई इस संगठन ने आजादी की लड़ाई में कोई निर्णायक योगदान दिया था और अलग पाकिस्तान को लेकर इसकी क्या राय थी? चलिये विस्तार से समझते हैं…

जमीयत उलमा-ए-हिंद का गठन वर्ष 1919 में हुआ था. यह वह दौर था जब प्रथम विश्व युद्ध के बाद भारत में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ असंतोष अपने चरम पर था. रॉलेट एक्ट, जलियांवाला बाग हत्याकांड और खिलाफ़त आंदोलन जैसे घटनाक्रमों ने पूरे देश को झकझोर दिया था. इसी पृष्ठभूमि में अब्दुल बारी फिरंगी महली, किफायतुल्ला दहलवी, मोहम्मद इब्राहिम मीर सियालकोटी और सनाउल्लाह अमृतसरी जैसे देवबंदी विचारधारा से जुड़े मुस्लिम धार्मिक विद्वानों ने जमीयत उलमा-ए-हिंद की स्थापना की. संगठन का मूल उद्देश्य ब्रिटिश शासन का विरोध करना, भारत की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करना और हिंदू-मुस्लिम एकता को मजबूत करना था.

मुस्लिम लीग से बिल्कुल अलग थी जमीयत की विचारधारा

जमीयत उलमा-ए-हिंद की विचारधारा उस समय मुस्लिम लीग की राजनीति से बिल्कुल अलग थी. जहां मुस्लिम लीग धर्म के आधार पर अलग राष्ट्र की मांग को आगे बढ़ा रही थी, वहीं जमीयत ने ‘मुत्तहिदा क़ौमियत’ यानी संयुक्त राष्ट्रवाद की अवधारणा को मजबूती से रखा. इस विचार के अनुसार, भारत में रहने वाले सभी लोग, चाहे वे किसी भी धर्म के हों, एक साझा राष्ट्र का हिस्सा हैं. जमीयत का मानना था कि राष्ट्र की पहचान मजहब से नहीं, बल्कि साझा भूगोल, इतिहास और संस्कृति से बनती है.

पाकिस्तान के बिल्कुल खिलाफ था जमीयत

जमीयत के प्रमुख नेताओं में मौलाना हुसैन अहमद मदनी का नाम विशेष रूप से लिया जाता है. उन्होंने बार-बार यह तर्क दिया कि इस्लाम कभी भी राष्ट्र को धर्म के आधार पर परिभाषित नहीं करता. उनके अनुसार, मुसलमानों का भविष्य एक संयुक्त, स्वतंत्र और धर्मनिरपेक्ष भारत में ही सुरक्षित है. मौलाना मदनी के ये विचार उस दौर में काफी प्रभावशाली थे और कांग्रेस नेतृत्व, खासकर महात्मा गांधी, से उनकी वैचारिक नजदीकी भी इसी वजह से बनी.

महात्मा गांधी के समर्थन में रहा जमीयत

महात्मा गांधी और जमीयत उलमा-ए-हिंद के संबंध केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि नैतिक और वैचारिक भी थे. खिलाफ़त आंदोलन के दौरान जमीयत ने खुलकर गांधी का समर्थन किया. इस आंदोलन ने हिंदू और मुस्लिम समुदायों को एक साझा मंच पर लाने में बड़ी भूमिका निभाई. जमीयत के नेताओं ने देशभर में जाकर मुस्लिम समाज से अपील की कि वे अंग्रेजों के खिलाफ असहयोग आंदोलन में हिस्सा लें और कांग्रेस के नेतृत्व में चल रहे स्वतंत्रता संग्राम का समर्थन करें.

आजादी की लड़ाई में चुकाई भारी कीमत

ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष में जमीयत के कई नेताओं को भारी कीमत भी चुकानी पड़ी. संगठन से जुड़े कई उलमा को जेल भेजा गया, उनके भाषणों पर पाबंदियां लगीं और उन पर देशद्रोह के मुकदमे चलाए गए. शैख़-उल-हिंद मौलाना महमूद हसन जैसे नेता अंग्रेजों के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाने की कोशिशों के चलते गिरफ्तार किए गए और उन्हें माल्टा जैसी दूरस्थ जेलों में कैद रखा गया. यह सब इस बात का प्रमाण है कि जमीयत केवल वैचारिक समर्थन तक सीमित नहीं थी, बल्कि उसने प्रत्यक्ष रूप से औपनिवेशिक सत्ता को चुनौती दी.

अखंड भारत की वकालत

1940 के दशक में जब मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान की मांग को और तेज कर दिया, तब जमीयत उलमा-ए-हिंद ने इसका खुलकर विरोध किया. संगठन का स्पष्ट मत था कि भारत का विभाजन न तो मुसलमानों के हित में है और न ही देश के भविष्य के लिए अच्छा है. जमीयत का मानना था कि विभाजन से सांप्रदायिक हिंसा बढ़ेगी और मुसलमान अल्पसंख्यक होकर और ज्यादा असुरक्षित हो जाएंगे. यही कारण था कि जमीयत के कई नेता आखिरी समय तक एक अखंड भारत की वकालत करते रहे.

दंगा पीड़ितों को पहुंचाई मदद

हालांकि इतिहास की त्रासदी यह रही कि तमाम विरोधों और आशंकाओं के बावजूद देश का बंटवारा हुआ. 1947 के विभाजन के दौरान जब पूरे उत्तर भारत में सांप्रदायिक हिंसा फैल गई, तब जमीयत उलमा-ए-हिंद ने राहत और बचाव कार्यों में भी भूमिका निभाई. संगठन के सदस्यों ने दंगों में फंसे लोगों की मदद की, शरणार्थियों के लिए राहत शिविरों में सहयोग किया और दोनों समुदायों से शांति बनाए रखने की अपील की. यह भूमिका भले ही राजनीतिक कम और मानवीय अधिक रही हो, लेकिन उस दौर में इसका महत्व कम नहीं था.

आजादी के बाद भी जमीयत उलमा-ए-हिंद ने भारतीय संविधान और लोकतांत्रिक व्यवस्था को स्वीकार किया. संगठन ने बार-बार यह कहा कि भारत का संविधान सभी नागरिकों को समान अधिकार देता है और यही देश की ताकत है. जमीयत ने धर्मनिरपेक्षता, राष्ट्रीय एकता और अखंडता के समर्थन में अपनी प्रतिबद्धता दोहराई और खुद को भारतीय गणराज्य के ढांचे के भीतर ही रखा.

क्या कहते हैं इतिहासकार?

इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के संदर्भ में तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी का बयान सामने आया है. उनका कहना है कि भारत की आजादी में कांग्रेस के साथ-साथ जमीयत उलमा-ए-हिंद का भी योगदान रहा है और इस तथ्य को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए.

इतिहासकारों और शोधकर्ताओं की राय इस मुद्दे पर बंटी हुई नहीं है. अधिकांश इतिहासकार मानते हैं कि जमीयत उलमा-ए-हिंद ने स्वतंत्रता संग्राम में कांग्रेस के सहयोगी के रूप में काम किया और संयुक्त भारत की अवधारणा को मजबूत करने में उसकी भूमिका रही. यह भी सच है कि जमीयत का प्रभाव पूरे मुस्लिम समाज पर समान रूप से नहीं था और मुस्लिम लीग की लोकप्रियता के सामने उसकी आवाज कमजोर पड़ गई, लेकिन इससे उसके योगदान को पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता.

कुल मिलाकर, भारत की आजादी की कहानी केवल एक संगठन या एक विचारधारा की कहानी नहीं है. यह अनेक धाराओं, संगठनों और नेताओं के संघर्ष का परिणाम है. जमीयत उलमा-ए-हिंद भी इसी बहुआयामी स्वतंत्रता संग्राम का एक हिस्सा थी. रेवंत रेड्डी का बयान इसी ऐतिहासिक सच्चाई की ओर इशारा करता है. भले ही इस पर राजनीतिक बहस जारी रहे, लेकिन यह तथ्य इतिहास के दस्तावेजों में दर्ज है कि जमीयत ने अंग्रेजी शासन के खिलाफ संघर्ष किया, हिंदू-मुस्लिम एकता की वकालत की और एक अखंड भारत के पक्ष में खड़ी रही.

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