नई दिल्ली/कोहिमा: पूर्वोत्तर में एक ऐसी दुनिया बसती है जिसे ‘लोककथाओं की भूमि’ कहा जाता है. हम बात कर रहे हैं नागालैंड की. यह भारत का वह राज्य है जहां के पहाड़ कहानियां सुनाते हैं और घाटियां इतिहास की गवाह हैं. 1 दिसंबर का दिन इस राज्य के लिए बेहद खास है. साल 1963 में इसी तारीख को नागालैंड को भारत के 16वें राज्य का दर्जा मिला था. लेकिन यह सफर इतना आसान नहीं था. नागालैंड की कहानी शौर्य, परंपरा और कभी न झुकने वाले जज्बे की कहानी है. यहां के कबीले कभी किसी के गुलाम नहीं रहे. चाहे वह असम के ताकतवर अहोम राजा हों या फिर दुनिया पर राज करने वाले अंग्रेज.
गुलामी की जंजीरों से आजाद रहा इतिहास
नागालैंड के इतिहास के पन्ने पलटें तो एक बात साफ हो जाती है कि नागा कबीलों को गुलाम बनाना नामुमकिन था. 12वीं और 13वीं शताब्दी में नागा लोगों का संपर्क असम के अहोम साम्राज्य से हुआ. अहोम राजवंश उस समय बेहद शक्तिशाली था. वे कागज पर भले ही दावा करते थे कि नागालैंड उनके अधीन है, लेकिन असलियत कुछ और थी. जमीनी हकीकत में नागा कबीले पूरी तरह आजाद थे. वे अपनी मर्जी के मालिक थे. अहोम राजाओं ने भी कभी उनकी परंपराओं में दखल देने की हिम्मत नहीं की.
यहां तक कि 19वीं सदी में जब ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत पर कब्जा जमाना शुरू किया, तो उन्हें भी यहां लोहे के चने चबाने पड़े. अंग्रेजों ने बड़ी मुश्किल से नागालैंड के कुछ इलाकों पर नियंत्रण किया. लेकिन उन्हें सबसे ज्यादा दिक्कत नागाओं की पुरानी परंपराओं को खत्म करने में आई. इसमें ‘नरबली’ जैसी खौफनाक परंपरा भी शामिल थी, जिसे खत्म करने में अंग्रेजों के पसीने छूट गए थे.
धर्म बदला पर नहीं छोड़ी अपनी जड़ें
नागालैंड की सबसे खूबसूरत बात यहां का सामाजिक ताना-बाना है. अंग्रेजों के आने के बाद यहां बड़े पैमाने पर धर्म परिवर्तन हुआ. मिशनरीज ने यहां शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम किया. नतीजा यह हुआ कि राज्य की करीब 90 प्रतिशत आबादी ईसाई बन गई. लेकिन धर्म बदलने का मतलब यह नहीं था कि उन्होंने अपनी संस्कृति को त्याग दिया. आज भी नागालैंड के लोग अपनी जड़ों से वैसे ही जुड़े हैं जैसे सदियों पहले थे. वे आज भी अपने रंग-बिरंगे पारंपरिक परिधान पहनते हैं. उनके रीति-रिवाज, लोकगीत और त्योहार आज भी उनकी पहचान हैं. ईसाई धर्म अपनाने के बावजूद उन्होंने अपनी कबीलाई पहचान को मिटने नहीं दिया. यह दुनिया के लिए एक मिसाल है कि कैसे आधुनिकता और परंपरा साथ-साथ चल सकती हैं.
विश्व युद्ध और राष्ट्रवाद का उदय
आपको जानकर हैरानी होगी कि नागालैंड के राष्ट्रवाद की चिंगारी यूरोप से भड़की थी. पहले विश्व युद्ध के दौरान अंग्रेजों को लड़ाकों की जरूरत थी. उन्होंने नागा कबीलों के कई लोगों को भर्ती किया. इन नागा सैनिकों को फ्रांस और यूरोप के अन्य देशों में भेजा गया. जब ये लोग यूरोप से वापस लौटे, तो उनकी सोच बदल चुकी थी. उन्होंने दुनिया देखी थी और आजादी का मतलब समझा था. इन्हीं लोगों ने वापस आकर ‘नागा नेशनलिस्ट मूवमेंट’ की नींव रखी. उन्होंने अपनी पहचान और अपने अधिकारों के लिए आवाज उठानी शुरू की.
नेहरू से मुलाकात और 16-पॉइंट एग्रीमेंट
आजादी के बाद भी नागालैंड का संघर्ष जारी रहा. 1947 में भारत आजाद हुआ, लेकिन 1957 तक यह इलाका असम राज्य का सिर्फ एक जिला था. इसे ‘नागा हिल्स’ कहा जाता था. नागा लोग अपनी अलग पहचान चाहते थे. अगस्त 1957 में अलग-अलग नागा कबीलों के नेताओं ने मिलकर ‘नागा पीपल्स कन्वेंशन’ (NPC) का गठन किया.
जुलाई 1960 का समय ऐतिहासिक था. एनपीसी का एक प्रतिनिधिमंडल तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से मिलने दिल्ली पहुंचा. उन्होंने इंडियन यूनियन के अंदर नागाओं के लिए एक अलग राज्य की मांग रखी. नेहरू ने उनकी बात सुनी और एक ऐतिहासिक समझौता हुआ. इसे ’16-पॉइंट एग्रीमेंट’ के नाम से जाना जाता है. इसी समझौते ने नागालैंड राज्य के गठन का रास्ता साफ किया. इसके बाद 1962 में संसद ने ‘स्टेट ऑफ नागालैंड एक्ट’ पास किया और 1 दिसंबर 1963 को नागालैंड भारत का 16वां राज्य बन गया.
‘यारुइंगम’ यानी जनता का राज
नागालैंड के संघर्ष और वहां के समाज को समझने के लिए साहित्य का सहारा भी लिया जा सकता है. बीरेंद्र कुमार भट्टाचार्य का मशहूर उपन्यास ‘यारुइंगम’ इसी पृष्ठभूमि पर लिखा गया है. यह 1950 के दशक में लिखा गया और 1960 में प्रकाशित हुआ. ‘यारुइंगम’ शब्द का अर्थ है- जनता का शासन. यह उपन्यास तंगखुल नागाओं के जीवन और उनके आत्मनिर्णय के संघर्ष को बहुत गहराई से बयां करता है. यह उस दौर के राजनीतिक और सामाजिक बदलावों का एक जीवंत दस्तावेज है.
17 कबीले और पूर्व का स्विट्जरलैंड
भौगोलिक रूप से नागालैंड एक अजूबा है. यह पश्चिम में असम, पूर्व में म्यांमार (बर्मा), उत्तर में अरुणाचल प्रदेश और दक्षिण में मणिपुर से घिरा है. राज्य में 17 प्रशासनिक जिले हैं और यहां 17 प्रमुख जनजातियां रहती हैं. हर जनजाति की अपनी अलग बोली है, अपना अलग पहनावा है और अपने अलग रीति-रिवाज हैं. इतनी विविधता होने के बावजूद वे सब एक साथ रहते हैं.
इसकी खूबसूरती की वजह से इसे ‘पूर्व का स्विट्जरलैंड’ कहा जाता है. हरी-भरी पहाड़ियां, घने जंगल और शानदार घाटियां किसी का भी मन मोह लेती हैं. यह जगह ट्रैकिंग, रॉक क्लाइम्बिंग और जंगल कैम्पिंग के लिए जन्नत है. यहां के जंगलों में औषधीय पौधों का खजाना छिपा है. अगर कोई शहरी शोर-शराबे से दूर शांति की तलाश में है, तो नागालैंड उसकी मंजिल है. यहां का सूर्योदय और सूर्यास्त देखना एक जादुई अनुभव होता है. आज जब नागालैंड अपना स्थापना दिवस मना रहा है, तो यह याद रखना जरूरी है कि यह राज्य सिर्फ भारत के नक्शे पर एक लकीर नहीं है. यह अदम्य साहस, कभी न हार मानने वाले जज्बे और प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर जीने वाली एक महान संस्कृति का प्रतीक है.

