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कौन हैं जनरल नरवणे, जिनकी अप्रकाशित आत्मकथा पर विवाद, पूर्व सैन्य अफसर की किताब प्रकाशन के क्या हैं नियम


राहुल गांधी ने लोकसभा में जब पूर्व थल सेना प्रमुख जनरल एमएम नरवणे की अप्रकाशित आत्मकथा के अंश पढ़ने शुरू किए तो हंगामा मच गया. स्पीकर ने उन्हें इसकी अनुमति नहीं दी. इसे लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष में हंगामा शुरू हो गया. फिर लोकसभा का कार्रवाई रोकनी पड़ी. पूर्व आर्मी चीफ की किताब आखिर क्यों अब तक प्रकाशित नहीं हो पाई. जब कोई सैन्य अफसर किताब लिखे, तो उसको इसे प्रकाशित करने की हरी झंडी लेने के लिए किन नियमों से गुजरना पड़ता है.

जनरल मनोज मुकुंद नरवाणे भारतीय थलसेना के 27वें सेना प्रमुख थे. उन्होंने 31 दिसंबर 2019 से 30 अप्रैल 2022 तक यह पद संभाला. वह 2020 के गलवान घाटी संघर्ष के दौरान सेना प्रमुख थे. उन्होंने पूर्वी लद्दाख, डोकलाम (2017) और कई अन्य ऑपरेशन्स में अहम भूमिका निभाई. अब उनकी अप्रकाशित किताब पर घमासान मचा हुआ है.

जनरल नरवणे ने चार दशकों तक सेना की शानदार और सराहनीय सेवा की. जब वह रिटायर हुए तो उनकी सेवानिवृत्ति पर सरकार ने नोट जारी किया, जनरल नरवणे को कोविड-19 महामारी के दौरान भारतीय सेना के कर्मियों के स्वास्थ्य को सुनिश्चित करने , पूर्वी लद्दाख में उत्तरी शत्रु को दृढ़ता से जवाब देने और आत्मनिर्भरता की दिशा में दृढ़ प्रयास करने के साथ-साथ भविष्य के युद्धों से लड़ने के लिए विशिष्ट और विघटनकारी प्रौद्योगिकियों को अपनाने के लिए याद किया जाएगा

“जनरल नरवणे सच्चे सैनिक थे. सैनिकों के कल्याण को लेकर चिंतित रहते थे. उन्होंने जम्मू-कश्मीर, पूर्वी लद्दाख और उत्तर-पूर्व के अग्रिम क्षेत्रों का कई बार दौरा किया और अप्रैल 2020 के बाद पूर्वी लद्दाख में नए भर्ती हुए सैनिकों के लिए आवास और रहने की जगहों के तेजी से निर्माण के मामलों को सक्रिय रूप से आगे बढ़ाया,” नोट में कहा गया.

जनरल नरवाणे की आत्मकथा का नाम है – फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी. इस किताब के प्रकाशक पेंग्विन रेंडम हाउस हैं. ये किताब 2023-24 में प्रकाशित होने वाली थी, लेकिन ये अब तक अप्रकाशित है.

अप्रैल 2024 में प्रकाशित होने वाली इस पुस्तक के कुछ अंश समाचार एजेंसी पीटीआई द्वारा दिसंबर 2023 में प्रकाशित किए गए. इसके बाद पूरी प्रकाशन प्रक्रिया रोक दी गई.

किताब पर विवाद की वजह

जनरल नरवणे ने इस किताब में गलवान संघर्ष से लेकर अग्निवीर जैसे मामलों को लिखा है. इसी बात पर विवाद है. जब इस अप्रकाशित किताब के अंश लोकसभा में नेता विपक्ष राहुल गांधी ने पढ़ने शुरू किये तो सत्ता पक्ष ने तुरंत इस पर आपत्ति की. इसके बाद सदन में शोरगुल शुरू हो गया. स्पीकर ने राहुल गांधी को अप्रकाशित किताब पर बोलने की अनुमति नहीं दी. इसे नियमों के खिलाफ बताया. इस किताब की इन बातों पर विवाद है

– वर्ष 2020 में गलवान, डेपसांग और पेंगोंग स्थित सीमा की जगहों की बात लिखी है. ये लिखा है कि जब गलवान में चीन के टैंक सामने आकर खड़े हो गए तो राजनीतिक नेतृत्व से साफ आदेश नहीं मिला. चीनी टैंक भारतीय क्षेत्र में घुस आए थे, लेकिन “फायर ओपन करने की इजाजत टॉप लेवल से नहीं मिली”.

– अग्निपथ योजना पर बड़ा खुलासा – नरवणे के अनुसार उनकी मूल प्रस्ताव अलग था, लेकिन PMO ने इसे पूरी तरह बदल दिया.

– किताब में सरकार की चीन क्राइसिस को लेकर नैटिव स्पिनिंग पर सवाल उठाए गए हैं.

इन संवेदनशील खुलासों के कारण रक्षा मंत्रालय और सेना हेडक्वार्टर ने किताब की प्री-पब्लिकेशन रिव्यू कराई. अभी तक क्लियरेंस नहीं मिला है. अक्टूबर 2025 में जनरल नरवाणे ने खुद कहा, मेरा काम किताब लिखना था. अब गेंद पब्लिशर और रक्षा मंत्रालय के पाले में है.

सवाल – सैन्य अधिकारी की किताब प्रकाशन के नियम क्या हैं?

– सेवारत अफसर के आर्मी एक्ट 1950, आर्मी एक्ट 1954 (सेक्शन 21) के तहत किताब लिखने के नियम बहुत सख्त हैं. अफसर सेना से जुड़े किसी मामले, सैन्य ऑपरेशन, राजनीतिक मुद्दा या सर्विस इंफॉर्मेशन वाली किताब, आर्टिकल केंद्र सरकार के बगैर अनुमति के नहीं प्रकाशित कर सकते हैं. यहां तक कि बगैर अनुमति लेक्चर भी नहीं दे सकते. अगर उन्होंने ऐसा नहीं किया तो उल्लंघन पर अनुशासनिक कार्रवाई हो सकती है.

सवाल – क्या रिटायर्ड सैन्य अफसर अपनी किताब प्रकाशित करा सकते हैं?

– सेना के नियमों में रिटायर्ड अधिकारियों के लिए स्पष्ट नियम नहीं लिखे हैं. लेकिन व्यवहार में लेफ्टिनेंट जनरल और ऊपर के रैंक के अफसरों को किताब के लिए रक्षा मंत्रालय और सेना मुख्यालय से प्री-पब्लिकेशन सिक्योरिटी क्लियरेंस लेना पड़ता है. अगर किताब में संवेदनशील ऑपरेशन, चाइना, पाकिस्तान संबंधी डिटेल, नीति-निर्माण या आंतरिक चर्चा हो तो रिव्यू करीब अनिवार्य है.

सवाल – क्या पूर्व भारतीय सैन्य अफसरों की किताबें प्रकाशित होती रही हैं?

– बिल्कुल. भारतीय सैन्य अफसरों की बहुत सी किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं. आर्मी चीफ रह चुके अधिकारियों की 8-10 आत्मकथाएं प्रकाशित हो चुकी हैं. इससे नीचे स्तर के अधिकारियों की 100 से ज्यादा किताबों का प्रकाशन हो चुका है.

जनरल नरवणे का विशिष्ट सैन्य करियर

राष्ट्रीय रक्षा अकादमी और भारतीय सैन्य अकादमी के पूर्व छात्र नरवणे को जून 1980 में सिख लाइट इन्फैंट्री रेजिमेंट में कमीशन प्राप्त हुआ. वे वेलिंगटन स्थित डिफेंस सर्विसेज स्टाफ कॉलेज और महू स्थित हायर कमांड कोर्स के भी पूर्व छात्र हैं. जनरल ऑफिसर के पास रक्षा अध्ययन में मास्टर डिग्री, रक्षा और प्रबंधन अध्ययन में एमफिल डिग्री है. वर्तमान में वह डॉक्टरेट की पढ़ाई कर रहे हैं.

जनरल नरवणे ने दिल्ली क्षेत्र के जनरल ऑफिसर कमांडिंग के रूप में 2017 में गणतंत्र दिवस परेड की कमान संभाली थी. शिमला में सेना प्रशिक्षण कमान और कोलकाता में पूर्वी कमान की सफल कमान संभालने के बाद, उन्होंने 31 दिसंबर 2019 को सेना प्रमुख का पदभार ग्रहण करने से पहले सेना के उप प्रमुख का पद संभाला.

चार दशकों से अधिक के अपने विशिष्ट सैन्य करियर में, उन्होंने पूर्वोत्तर और जम्मू और कश्मीर दोनों में शांति और युद्धक्षेत्र में महत्वपूर्ण कमान और स्टाफ पदों पर कार्य किया.

जनरल नारायण श्रीलंका में भारतीय शांति सेना के भी सदस्य थे. उन्होंने राष्ट्रीय राइफल्स बटालियन की कमान संभाली, एक इन्फैंट्री ब्रिगेड का गठन किया. असम राइफल्स (उत्तर) के महानिरीक्षक रहे और पश्चिमी मोर्चे पर एक स्ट्राइक कोर की कमान संभाली. उनके स्टाफ असाइनमेंट में एक इन्फैंट्री ब्रिगेड के ब्रिगेड मेजर, म्यांमार के यांगून में रक्षा अटैची, आर्मी वॉर कॉलेज में उच्च कमान विंग में डायरेक्टिंग स्टाफ के रूप में एक प्रशिक्षणात्मक नियुक्ति और नई दिल्ली में रक्षा मंत्रालय (सेना) के एकीकृत मुख्यालय में दो कार्यकाल शामिल हैं.

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