Wed. Feb 4th, 2026

Indian pharma companies| swati maliwal| drugs price in india| medicines profit| संसद में स्वाति मालीवाल ने दवाओं की कीमत और मुनाफाखोरी पर सवाल उठाए


दिल्ली से राज्यसभा सांसद स्वाति मालीवाल ने संसद की स्थायी समिति की 2025 की रिपोर्ट का हवाला देते हुए फार्मा कंपनियों की दवाइयों के रेट पर मनमानी के मुद्दे को संसद में उठाया. सांसद ने कहा, ‘कुछ फार्मा कंपनियां दवाइयों पर 600 फीसदी से 1100 फीसदी तक का मुनाफा कमा रही हैं. उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि सिट्रीज़ीन जो एक आम एलर्जी की दवा है, उसका प्राइस टू स्टॉकिस्ट 1.52 रुपये है लेकिन उसे 21.06 रुपये में बेचा जा रहा है. इसी तरह पेन किलर इबुप्रोफेन का प्राइस टू स्टॉकिस्ट 831 रुपये है और एमआरपी 4560 रुपये है. इंसुलिन इंजेक्शन के ब्रांड्स में 109 फीसदी तक का प्राइस वेरिएशन है.’

इसके साथ ही कहा कि कुछ जरूरी एंटीबायोटिक्स और लाइफ सेविंग कैंसर ड्रग्स की लागत तो लाखों में है. उन्होंने केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री जगत प्रकाश नड्डा से सवाल पूछते हुए कहा कि क्या सरकार एक मजबूत रेगुलेटरी फ्रेमवर्क सेट करेगी जिससे यह मुनाफाखोरी बंद हो और आम इंसान को दवाई सस्ती मिल सके.

हालांकि इसके जवाब में केंद्रीय मंत्री नड्डा ने कहा कि आपका सवाल नीति से जुड़ा मुद्दा है, सरकार की प्राइसिंग पॉलिसी व ड्रग पॉलिसी निरंतर और पारदर्शी प्रक्रिया है, जिसे विभाग द्वारा समय-समय पर किया जाता है ताकि मौजूदा नीति की प्रासंगिकता, प्रभाव और कार्यक्षमता का आकलन किया जा सके और अगर किसी सुधार की जरूरत हो तो सभी हितधारकों के हितों को ध्यान में रखते हुए किया जा सके.

उन्होंने कहा कि विभाग और राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) ने फार्मास्युटिकल उद्योग से जुड़े विभिन्न संगठनों जैसे CII, FICCI, OPPI, IPA, AIMED, ADVAMED, MTAI, USIBC, ASSOCHAM, NATHEALTH आदि, एमएसएमई संगठनों जैसे लघु उद्योग भारती, IDMA, FOPE और मरीजों के हित से जुड़े समूह जैसे AIDAN, MSF, इंडिया फाउंडेशन की पेशेंट सेफ्टी एंड एक्सेस इनिशिएटिव आदि के साथ राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण नीति, 2012 (NPPP, 2012) और ड्रग (प्राइस कंट्रोल) ऑर्डर, 2013 (DPCO, 2013) से संबंधित मामलों पर परामर्श किया है. मौजूदा नीति ढांचे के संचालन पर हितधारकों से फीडबैक प्राप्त हुआ.

इन परामर्शों के दौरान प्राप्त सुझाव से यह जानकारी मिलती है कि मौजूदा नीति में किन मुद्दों के समाधान की जरूरत है. विभाग और NPPA हितधारकों के साथ लगातार संपर्क में रहते हैं ताकि समस्याओं को समझा जा सके और उन्हें या तो मौजूदा व्यवस्था के तहत या आवश्यक प्रावधान करके हल किया जा सके.

इससे आगे सांसद स्वाति मालीवाल ने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री से सवाल पूछते हुए कहा कि मंत्रालय ने 2024 में एक स्पेशल ऑडिट किया था जिससे पता चला था कि एक फार्मास्युटिकल कंपनी ने लगभग 2 करोड़ रुपये खर्च करके 30 डॉक्टरों को पेरिस घुमाया. ऐसा पहली बार नहीं हुआ है. फार्मा कंपनियां कई बार डॉक्टरों को इंसेंटिव देती हैं, अगर आप यह इंजेक्शन प्रिस्क्राइब करेंगे, तो हर इंजेक्शन पर इतना पैसा मिलेगा, अगर वॉल्यूम ज्यादा होगा, तो फॉरेन ट्रिप कन्फर्म.’

सांसद ने पूछा कि उस फार्मा कंपनी के खिलाफ क्या कार्रवाई की गई जिसने डॉक्टरों को फ्रांस ले जाया गया. इसके साथ ही पूछा कि क्या सरकार इस समस्या को रेगुलेट करने के लिए कोई सख्‍त कानून ला रही है? इसका जवाब देते हुए केंद्रीय मंत्री ने कहा कि यह इंडियन मेडिकल एसोसिएशन से संबंधित मामला है. फार्मा विभाग की तरफ से ऐसा नहीं करते हैं, लेकिन आईएमए के कोड ऑफ कंडक्ट हैं वे कोड ऑफ कंडक्ट के तहत कार्रवाई करते हैं, लाइसेंस कैंसिल करते हैं, उनके खिलाफ एक्शन भी लेते हैं.

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