भारत और फ्रांस के बीच प्रस्तावित 114 लड़ाकू विमानों की मल्टीरोल फाइटर एयरक्राफ्ट (MRFA) डील अब केवल विमानों की संख्या, हथियारों या कीमत तक सीमित नहीं रह गई है. यह सौदा अब ‘सॉफ्टवेयर सॉवरेंटी’ यानी सॉफ्टवेयर पर स्वायत्त नियंत्रण के सवाल पर भी केंद्रित होता जा रहा है. ‘इंडियन डिफेंस रिसर्च विंग’ की रिपोर्ट की मानें तो भारतीय वायुसेना (IAF) इस डील के तहत अतिरिक्त Dassault Rafale विमानों के लिए बातचीत कर रही है और उसका जोर इस बात पर है कि उसे मिशन सॉफ्टवेयर के एक हिस्से के विकास और इंटीग्रेशन में स्वतंत्र भूमिका मिले. आमतौर पर आधुनिक लड़ाकू विमान सौदों में मूल सोर्स कोड तक पूरी पहुंच नहीं दी जाती, क्योंकि यह निर्माता कंपनी की बौद्धिक संपदा (Intellectual Property) होती है. राफेल के मामले में भी इसका पूर्ण ट्रांसफर संभव नहीं माना जा रहा है. हालांकि, बातचीत में एक मध्य मार्ग पर चर्चा हो रही है – API (एप्लिकेशन प्रोग्रामिंग इंटरफेस) लेवल तक एक्सेस. यह व्यवस्था भारतीय इंजीनियरों को विमान के सॉफ्टवेयर लेयर के भीतर अपने मॉड्यूल विकसित करने और उन्हें सिस्टम से जोड़ने की अनुमति दे सकती है, जबकि मूल फ्लाइट कंट्रोल और सिक्योरिटी या सोर्स कोड पर नियंत्रण मूल कंपनी यानी डसॉल्ट के पास ही रहेगा. तो क्या एयरफोर्स की डिमांड से राफेल डील पर कोई विपरीत असर पड़ सकता है? या फ्रांस वो रियायत देने के लिए तैयार हो जाएगा, यह सौदे से जुड़ी शर्तें सार्वजनिक होने के बाद ही पता चल सकेगा.
राफेल: आसमान का बादशाह
- शक्तिशाली इंजन (High Thrust)
अधिकतम थ्रस्ट: 2 × 7.5 टन
दो इंजन इसे बेहतर स्पीड, तेजी से चढ़ाई (climb rate) और युद्धक क्षमता देते हैं.
- हाई G-फोर्स सहन क्षमता
लिमिट लोड फैक्टर: -3.2 g से +9 g
यह जेट तेज मोड़ और आक्रामक हवाई युद्ध (dogfight) में बेहतरीन प्रदर्शन करता है.
- बेहतरीन अधिकतम रफ्तार
अधिकतम गति: Mach 1.8 (2200 KMPH से ज्यादा)
यह ध्वनि की गति से लगभग 1.8 गुना तेज उड़ सकता है.
- सर्विस सीलिंग
अधिकतम ऑपरेशनल ऊंचाई: 50000 फीट
दुश्मन की रडार रेंज से बचते हुए ऊंची उड़ान में मिशन पूरा करने में सक्षम.
IAF की क्या है दूरगामी सोच?
सूत्रों के अनुसार, भारतीय वायुसेना चाहती है कि उसके इन-हाउस सॉफ्टवेयर टीम भविष्य में हथियारों, सेंसरों और स्वदेशी सिस्टम्स के इंटीग्रेशन का बड़ा हिस्सा स्वयं संभाल सके. मॉडर्न फाइटर जेट में सॉफ्टवेयर केवल एक सहायक घटक नहीं, बल्कि वह सेंट्रल लेवल है जो रडार, हथियार, एवियोनिक्स और मिशन सिस्टम को इंटीग्रेटेड नेटवर्क में बदलती है. हर नए हथियार या सेंसर के जुड़ने पर विमान के ऑपरेशनल सॉफ्टवेयर को अपडेट करना पड़ता है, ताकि वह नए हार्डवेयर को पहचान सके और सुरक्षित रूप से उसका उपयोग कर सके. अब तक यह प्रक्रिया मूल निर्माता (Dassault Aviation) के नेतृत्व में होती रही है. इसमें कोडिंग, सिमुलेशन, लैब ट्रायल, फ्लाइट सर्टिफिकेशन और सुरक्षा मानकों के अनुरूप वेरिफिकेशन शामिल होता है. यह मॉडल विश्वसनीयता सुनिश्चित करता है, लेकिन हर अपडेट के लिए विदेशी कंपनी पर निर्भरता बढ़ाता है और लागत और समय दोनों में वृद्धि करता है. विशेष रूप से तब, जब अपग्रेड चक्र तेज़ हो और नई क्षमताएं लगातार जोड़ी जा रही हों.
Rafale Fighter Jet Deal: इंडियन एयरफोर्स चाहता है कि राफेल मेगा डील में उसे सॉफ्टवेयर और वेपन इंटीग्रेशन की ऑटोनोमी यानी आजादी दी जाए, ताकि भविष्य में जेट को अपग्रेड करने में ज्यादा देरी न हो. (फाइल फोटो/Reuters)
क्या है API?
IAF का API बेस्ड मॉडल इसी निर्भरता को कम करने की दिशा में एक प्रयास है. API एक कंट्रोल्ड ब्रिज की तरह काम करता है, जो मूल सॉफ्टवेयर और आउटर मॉड्यूल के बीच कनेक्शन की अनुमति देता है. इस ढांचे के तहत भारतीय इंजीनियर मिशन सॉफ्टवेयर या इंटीग्रेशन कोड लिख सकते हैं, जो पूर्व निर्धारित इंटरफेस के माध्यम से विमान की प्रणालियों से जुड़ेंगे. वहीं, फ्लाइट-कंट्रोल और सुरक्षा से जुड़े मूल एल्गोरिद्म पर नियंत्रण निर्माता के पास ही रहेगा. यह मांग अचानक नहीं उठी है. भारतीय वायुसेना ने पिछले वर्षों में स्वदेशी प्रोग्राम के जरिए महत्वपूर्ण तकनीकी क्षमता विकसित की है. HAL Tejas Mk1A कार्यक्रम के तहत मिशन सॉफ्टवेयर विकास और वेपन इंटीग्रेशन में भारतीय इंजीनियरों ने अहम भूमिका निभाई है. इसी तरह Sukhoi Su-30MKI बेड़े में विभिन्न स्वदेशी हथियारों और प्रणालियों के इंटीग्रेशन का अनुभव भी वायुसेना को मिला है. इन परियोजनाओं ने एक मजबूत सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग इकोलॉजिकल मेकेनिज्म तैयार किया है. आने वाले समय में Tejas MkII कार्यक्रम में भी IAF की भूमिका और गहरी होने की उम्मीद है. इससे वायुसेना को विश्वास मिला है कि वह विमान सॉफ्टवेयर लाइफ-सायकल के बड़े हिस्से को घरेलू स्तर पर संभाल सकती है. प्रस्तावित मॉडल के तहत भारतीय टीमें नए स्वदेशी हथियारों या सेंसरों के लिए ऑपरेशनल इंटीग्रेशन कोड विकसित करेंगी, जबकि डसॉल्ट केवल अंतिम वेरिफिकेशन, सर्टिफिकेश और डिजिटल ब्रेन यानी फ्लाइट-कंट्रोल कोर में आवश्यक अपडेट पर ध्यान देगा.
114 राफेल विमान की खरीद इतना खास क्यों है?
रक्षा मंत्रालय की रक्षा खरीद परिषद (DAC) ने फ्रांस से 114 राफेल लड़ाकू विमान खरीदने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है. यह सौदा करीब 3.25 लाख करोड़ रुपये का बताया जा रहा है और इसे भारत के इतिहास के सबसे बड़े रक्षा सौदों में से एक माना जा रहा है. यह फैसला रक्षा मंत्री Rajnath Singh की अध्यक्षता में हुई बैठक में लिया गया. फ्रांस के राष्ट्रपति Emmanuel Macron की भारत यात्रा से पहले आए इस फैसले को रणनीतिक रूप से भी अहम माना जा रहा है. अंतिम मंजूरी अब प्रधानमंत्री Narendra Modi की अध्यक्षता वाली कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी से ली जाएगी.
इस डील से भारतीय वायुसेना को क्या फायदा होगा?
भारतीय वायुसेना के पास इस समय 29 स्क्वाड्रन हैं, जबकि आवश्यकता 42 स्क्वाड्रन की है. पुराने लड़ाकू विमान रिटायर हो रहे हैं, जिससे बेड़े में कमी आ रही है. 114 नए राफेल शामिल होने से यह कमी काफी हद तक दूर होगी. राफेल मल्टी-रोल फाइटर जेट हैं, जो हवा से हवा, हवा से जमीन और समुद्री लक्ष्यों पर सटीक हमला करने में सक्षम हैं. एयरफोर्स के अधिकारियों का मानना है कि इन जेट्स के शामिल होने से चीन और पाकिस्तान जैसे पड़ोसी देशों से मिलने वाली चुनौतियों का बेहतर तरीके से सामना किया जा सकेगा.
राफेल डील में ‘मेक इन इंडिया’ को कैसे बढ़ावा मिलेगा?
इस समझौते के तहत 114 में से 18 राफेल विमान फ्लाई-अवे कंडीशन में सीधे फ्रांस से आएंगे, जबकि 96 विमान भारत में ही बनाए जाएंगे. ये विमान फ्रांस की कंपनी Dassault Aviation से खरीदे जाएंगे. भारत में निर्माण से हजारों रोजगार सृजित होंगे और घरेलू रक्षा उद्योग को मजबूती मिलेगी. पहले ही Tata Advanced Systems Limited और डसॉल्ट एविएशन के बीच समझौते हो चुके हैं, जिससे तकनीकी सहयोग और डिलीवरी प्रक्रिया तेज होने की उम्मीद है.
राफेल की ताकत और हथियार प्रणाली क्या है?
राफेल अत्याधुनिक रडार, स्पेक्ट्रा इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम और कई आधुनिक हथियारों से लैस है. यह स्कैल्प (SCALP) क्रूज मिसाइल से लैस है, जो 250 किलोमीटर से अधिक दूरी तक सटीक वार कर सकती है. इसके अलावा मेटियोर हवा से हवा में मार करने वाली मिसाइल और हैमर प्रिसिजन गाइडेड हथियार भी इसकी ताकत बढ़ाते हैं. इन क्षमताओं के कारण राफेल को भारतीय वायुसेना की ‘गेम चेंजर’ ताकत माना जा रहा है.
भारत के पास पहले से कितने राफेल हैं और उनका उपयोग कब हुआ था?
भारतीय वायुसेना के पास पहले से 36 राफेल विमान दो स्क्वाड्रनों में शामिल हैं. ‘सी’ वेरिएंट की अंतिम डिलीवरी दिसंबर 2024 में हुई थी. इन विमानों का इस्तेमाल पिछले साल मई में पहलगाम आतंकी हमले के बाद चलाए गए Operation Sindoor में किया गया था, जहां पाकिस्तान के ठिकानों पर सटीक हमले किए गए थे. अब 114 नए राफेल शामिल होने से वायुसेना की मारक क्षमता और भी अधिक मजबूत होने जा रही है.
मांग मान ली गई तो क्या होगा फायदा?
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह व्यवस्था लागू होती है तो इंटीग्रेशन की सम0392मा में उल्लेखनीय कमी आ सकती है और लागत भी नियंत्रित रहेगी. तेज अपग्रेड चक्र का अर्थ है कि वायुसेना बदलती सामरिक जरूरतों के अनुसार अपने बेड़े को शीघ्र अनुकूलित कर सकेगी, बिना हर छोटे बदलाव के लिए विदेशी विकास पाइपलाइन का इंतजार किए. हालांकि, यह स्पष्ट नहीं है कि डसॉल्ट इस स्तर की API बेस्ड ऑटोनोमी पर सहमत होगा या नहीं. लड़ाकू विमानों के सॉफ्टवेयर तक पहुंच से जुड़े मुद्दे बौद्धिक संपदा, उड़ान सुरक्षा और लॉन्ग टर्म मॉडल से गहराई से जुड़े होते हैं. फिर भी यह तथ्य कि ऐसी चर्चा हो रही है, इस बात का संकेत है कि आधुनिक वायु शक्ति में हार्डवेयर से अधिक सॉफ्टवेयर नियंत्रण को रणनीतिक क्षमता के रूप में देखा जाने लगा है. MRFA सौदा इस बदलती प्राथमिकता का एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन सकता है.

