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PMO History and Legacy: स्वतंत्रता के बाद यह कॉरिडोर एक नए राष्ट्र के निर्माण की प्रयोगशाला बन गए. भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू साउथ ब्लॉक से काम करते थे, जबकि सरदार वल्लभभाई पटेल नॉर्थ ब्लॉक से 562 रियासतों के एकीकरण की प्रक्रिया की निगरानी कर रहे थे. इन्हीं दीवारों के भीतर पंचवर्षीय योजनाओं की रूपरेखा तैयार की गई, युद्ध और शांति से जुड़े निर्णय लिए गए और आर्थिक सुधारों की दिशा तय की गई.

PMO History and Legacy: रायसीना हिल के ट्विन ब्लॉक (नॉर्थ और साउथ) को लेकर एडविन लुटियंस और हर्बर्ट बेकर आपस में ही भिड़ गए थे. (फाइल फोटो/PTI)
PMO History and Legacy: प्रधानमंत्री द्वारा ‘सेवा तीर्थ’ परिसर के उद्घाटन के साथ ही प्रधानमंत्री कार्यालय यानी PMO का लगभग आठ दशक पुराना पता (साउथ ब्लॉक) अब इतिहास का हिस्सा बन रहा है. रायसीना हिल पर स्थित नॉर्थ और साउथ ब्लॉक (जिन्हें ब्रिटिश काल में सेक्रेटेरिएट कहा जाता था) अब ‘युगे युगीन भारत संग्रहालय’ के रूप में नए जीवन की तैयारी कर रहे हैं. लेकिन इन भव्य इमारतों की कहानी सिर्फ स्थापत्य वैभव की नहीं, बल्कि दो ब्रिटिश वास्तुकारों (एडविन लुटियंस और हरबर्ट बेकर) के बीच हुए टकराव की भी है.
साल 1911 में जब ब्रिटिश क्राउन ने भारत की राजधानी को कलकत्ता से दिल्ली ट्रांसफर करने की घोषणा की, तब नई शाही राजधानी की रूपरेखा तैयार करने की जिम्मेदारी एडविन लुटियंस को दी गई. लुटियंस की भव्य दृष्टि ने ‘लुटियंस दिल्ली’ को जन्म दिया. हालांकि, रायसीना हिल पर बने सेक्रेटेरिएट भवनों का डिजाइन उनके समकालीन हरबर्ट बेकर ने तैयार किया. 1931 में पूर्ण हुए ये ट्विन ब्लॉक ब्रिटिश साम्राज्य की शक्ति के प्रतीक के रूप में खड़े किए गए. बेकर भारतीय स्थापत्य से प्रभावित थे. उन्होंने लाल और क्रीम रंग के धौलपुर पत्थर, विशाल गुंबद, पिलर्स वाले बरामदे, छज्जे, जालियां और झरोखों जैसे भारतीय तत्वों को यूरोपीय शास्त्रीय शैली के साथ मिलाकर इमारतों को इंडो-सरसेनिक रिवाइवल शैली में गढ़ा. बेकर ने इसे इतना भव्य बनाया कि लोग इसे ‘रायसीना फोर्ट’ कहने लगे थे.
लुटियंस और बेकर के बीच क्यों हुई थी लड़ाई?
लेकिन इस भव्यता के पीछे एक गहरी पेशेवर खींचतान छिपी थी. विवाद का केंद्र था -सेक्रेटेरिएट भवनों की ऊंचाई और उनका स्थान, खासकर वायसराय हाउस (आज का राष्ट्रपति भवन) की तुलना में. लुटियंस चाहते थे कि सेक्रेटेरिएट बिल्डिंग्स अपेक्षाकृत निचले स्तर पर हों, ताकि वायसराय हाउस की भव्यता और उसकी विजिबिलिटी बाधित न हो. उनके अनुसार शाही निवास को वास्तुशिल्पीय रूप से सर्वोच्च और प्रभावी दिखना चाहिए. दूसरी ओर बेकर का मानना था कि सेक्रेटेरिएट भी उतना ही महत्वपूर्ण है और उसे समान प्रमुखता मिलनी चाहिए. उन्होंने इमारतों को ऊंचे प्लेटफॉर्म पर खड़ा करने की वकालत की जिससे वे ‘ग्रेट प्लेस’ से भव्य रूप में उभरें. आखिरकार बेकर की बात मानी गई. आज भी जब राजपथ (अब कर्तव्य पथ) से राष्ट्रपति भवन की ओर देखा जाता है तो सेक्रेटेरिएट की इमारतें अहम हिस्से के तौर पर दिखती हैं. ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ की रिपोर्ट के अनुसार, ऐसा कहा जाता है कि इस फैसले से लुटियंस बेहद असंतुष्ट थे और दोनों के संबंधों में स्थायी दरार आ गई.
किस ब्लॉक में बैठते थे नेहरू और पटेल?
बेकर ने दक्षिण अफ्रीका के प्रिटोरिया स्थित यूनियन बिल्डिंग्स से भी प्रेरणा ली थी, जिनका स्ट्रक्चर और टावर दिल्ली के सेक्रेटेरिएट से मिलते-जुलते हैं. इस समानता ने आलोचकों को यह कहने का मौका दिया कि बेकर ने अपने पूर्व काम की छाया दिल्ली पर भी डाली. 10 फरवरी 1931 को नई दिल्ली का उद्घाटन हुआ, लेकिन इसे कई भारतीयों ने औपनिवेशिक शक्ति प्रदर्शन के रूप में देखा. आजादी के बाद यही गलियारे नए भारत की नीतियों के साक्षी बने. देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू साउथ ब्लॉक से काम करते थे, जबकि सरदार वल्लभभाई पटेल नॉर्थ ब्लॉक से रियासतों के एकीकरण की प्रक्रिया का नेतृत्व कर रहे थे. बाद में प्रधानमंत्री कार्यालय का संस्थागत विस्तार हुआ और समय के साथ इसमें आधुनिकीकरण भी हुआ.
अब बनेंगे म्यूजियम
अब जब पीएमओ ‘सेवा तीर्थ’ में स्थानांतरित हो रहा है और नॉर्थ और साउथ ब्लॉक संग्रहालय में तब्दील होने जा रहे हैं, तब रायसीना हिल की ये इमारतें एक नए अध्याय की दहलीज पर खड़ी हैं. लुटियंस और बेकर के बीच कभी हुआ वह स्थापत्य विवाद आज भी इन पत्थरों में दर्ज है. बता दें कि लुटियंस और बेकर की गिनती दुनिया के बेहतरीन वास्तुकारों में होती है.
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बिहार, उत्तर प्रदेश और दिल्ली से प्रारंभिक के साथ उच्च शिक्षा हासिल की. झांसी से ग्रैजुएशन करने के बाद दिल्ली यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता में PG डिप्लोमा किया. Hindustan Times ग्रुप से प्रोफेशनल कॅरियर की शु…और पढ़ें

