पैर खोया मगर हौसला नहीं, 1965 जंग के उस अजेय वीर की कहानी- PHOTOS
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General Vijay Oberoi Inspiring Story: लेफ्टिनेंट जनरल विजय ओबेरॉय भारतीय सेना के उन वीर अधिकारियों में शामिल हैं जिन्होंने 1965 के युद्ध में अपना पैर खोने के बावजूद हार नहीं मानी. आर्टिफिशियल पैर के सहारे उन्होंने सेना में 40 साल से अधिक सेवा दी और वाइस चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ बने. उन्होंने मैराथन दौड़कर और घायल सैनिकों के लिए काम करके नई मिसाल कायम की. आइए इस खबर में पढ़ते हैं उनकी इंस्पायरिंग स्टोरी. (सभी फोटो सोशल मीडिया)

भारतीय सेना का हर जवान अदम्य साहस से भरा हुआ होता है. हर जवान अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए मर-मिटने की सौगंध खाता है. और इस सौगंध को पूरा करने के लिए हर जवान अपनी जान की बाजी लगा देता है. चाहे वह 1947 का युद्ध हो या फिर 1965, 1971 या 1999 की जंग हो. देश के वीर सैनिकों ने हर बार इस सौगंध को पूरा करने के अपनी जान देश पर न्योछावर किए. इन युद्धों में कई जवान देश के लिए शहीद हुए तो कईयों ने अपने हाथ-पैर गंवाए. कई जवानों ने युद्ध में हाथ-पैर गंवााने के बाद भी हार नहीं मानी और युद्ध के मैदान के बाहर भी अपना लोहा मनवाया. इन्हीं वीर योद्धा में से एक हैं जनरल विजय ओबेरॉय. 1965 की भारत-पाकिस्तान जंग में उन्होंने देश की रक्षा करते हुए अपना दायां पैर खो दिया. लेकिन उनकी हिम्मत और जज्बे ने हार नहीं मानी. उन्होंने एक पैर से मैराथन तक में भाग लिया. यही कारण है कि उनकी कहानी आज भी प्रेरणा का स्रोत बनी हुई है.

जनरल ओबेरॉय भारतीय सेना के उन जांबाज अधिकारियों में गिने जाते हैं, जिनकी जिंदगी साहस, अनुशासन और अदम्य इच्छाशक्ति की मिसाल है. 1965 के युद्ध के दौरान जब वे युवा कैप्टन थे, तब कश्मीर के दाचीगाम जंगल में उन्होंने पाकिस्तानी घुसपैठियों के खिलाफ बहादुरी से लड़ाई लड़ी. 27 अगस्त 1965 को इस अभियान के दौरान वे गंभीर रूप से घायल हो गए. हालत इतनी खराब थी कि उन्हें तुरंत पुणे के कमांड हॉस्पिटल ले जाया गया. डॉक्टरों ने उनकी जान बचाने के लिए 14 दिनों बाद उनका दायां पैर घुटने के नीचे से काटना पड़ा. लेकिन इस दर्दनाक हादसे के बाद भी उन्होंने सेना छोड़ने के बजाय नई लड़ाई लड़ने का फैसला किया.

गंभीर चोट और पैर खोने के बाद आमतौर पर सैनिकों को सेवा से हटना पड़ता है. लेकिन विजय ओबेरॉय ने इसे अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया. उन्होंने आर्टिफिशियल लिम्ब लगवाया और फिर से सक्रिय सैन्य सेवा में लौटे. वे मराठा लाइट इन्फेंट्री रेजिमेंट से जुड़े रहे और 18 मराठा लाइट इन्फैंट्री की कमान संभाली. उनकी नेतृत्व क्षमता और रणनीतिक सोच के कारण उन्हें लगातार प्रमोशन मिलता गया.
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समय के साथ उन्होंने ब्रिगेड और डिवीजन कमांडर जैसे महत्वपूर्ण पदों पर शानदार सेवा दी. अंततः साल 2001 में वे भारतीय सेना के दूसरे सर्वोच्च पद वाइस चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ बने. यह उपलब्धि बेहद दुर्लभ मानी जाती है. खासकर किसी ऐसे अधिकारी के लिए जिसने युद्ध में अपना पैर खो दिया हो. उन्हें उत्कृष्ट सेवा के लिए PVSM, AVSM और VSM जैसे प्रतिष्ठित सैन्य सम्मानों से भी सम्मानित किया गया.

सेना में अपनी शानदार सेवा के साथ-साथ उन्होंने खेलों में भी अपनी फिटनेस और जज्बे का लोहा मनवाया. 72 साल की उम्र में उन्होंने मुंबई मैराथन में हिस्सा लेकर लोगों को चौंका दिया. कृत्रिम पैर होने के बावजूद उन्होंने कई हाफ मैराथन और मैराथन पूरी कीं. उनकी दौड़ यह साबित करती है कि उम्र और शारीरिक सीमाएं किसी के हौसले को नहीं रोक सकतीं.

सेना से सेवानिवृत्ति के बाद भी उन्होंने समाज सेवा को अपना मिशन बनाया. वे वार वाउंडेड फाउंडेशन से जुड़े और युद्ध में घायल सैनिकों के रिहैबिलिटेशन के लिए काम किया. उनका मानना है कि युद्ध में घायल हुए सैनिकों को भी शहीदों की तरह सम्मान मिलना चाहिए. उन्होंने कई कार्यक्रमों और अभियानों के जरिए पूर्व सैनिकों की समस्याओं को उठाया.

विजय ओबेरॉय की कहानी सिर्फ सेना या खेल तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रेरणा की मिसाल बन चुकी है. वे कई मंचों पर अपने जीवन के अनुभव साझा करते हैं और युवाओं को कठिनाइयों से लड़ने की सीख देते हैं. उन्होंने TEDxBITSGoa जैसे मंचों पर भी अपनी कहानी सुनाई. इस कहानी ने हजारों लोगों को प्रेरित किया.

आज भी वे सक्रिय जीवन जी रहे हैं और पूर्व सैनिकों के अधिकारों के लिए आवाज उठाते रहते हैं. उनका जीवन यह सिखाता है कि असली ताकत शरीर में नहीं बल्कि मन में होती है. 50 साल से अधिक समय तक कृत्रिम पैर के साथ सक्रिय रहना और सेना से लेकर समाज तक योगदान देना उन्हें भारत के महान सैनिकों में शामिल करता है. उनकी कहानी हर उस व्यक्ति को प्रेरित करती है जो जीवन में संघर्षों से जूझ रहा है.

