भारत-अमेरिका ट्रेड डील के वक्त अमेरिका की ओर से कहा गया कि भारत रूस से तेल खरीदना बंद कर रहा है, इसलिए टैरिफ को 50% से घटाकर 18% किया जा रहा है. रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, इस रियायत के पीछे अमेरिका की एक शर्त थी कि भारत रूस से तेल खरीदना बंद करे और वेनेजुएला जैसे अन्य स्रोतों की ओर मुड़े. इस पर जयशंकर ने म्यूनिख में दहाड़ते हुए कहा, भारत की तेल कंपनियां, चाहे वो सरकारी हों या निजी, बाजार के रुख को देखकर फैसला लेती हैं. हमारी प्राथमिकता हमारी एनर्जी सिक्योरिटी है और हम अपनी स्ट्रेटजिक ऑटोनॉमी बनाए रखेंगे.
सवाल-जवाब से समझें यह इतना महत्वपूर्ण क्यों
जयशंकर के इस बयान को इतना बड़ा ‘बयान’ क्यों माना जा रहा है?
इसे बड़ा इसलिए माना जा रहा है क्योंकि यह भारत-अमेरिका ट्रेड डील के तुरंत बाद आया है. आमतौर पर जब दो देश व्यापारिक समझौता करते हैं, तो माना जाता है कि वे एक-दूसरे की राजनीतिक शर्तों को मानेंगे. लेकिन जयशंकर ने ट्रेड डील के ‘हनीमून पीरियड’ में ही साफ कर दिया कि व्यापार अपनी जगह है और हमारी आज़ाद विदेश नीति अपनी जगह.
’स्ट्रेटेजिक ऑटोनॉमी’ का क्या मतलब है, जिसका जिक्र जयशंकर ने किया?
इसका सीधा मतलब है ‘रणनीतिक स्वायत्तता’. यानी भारत अपने फैसले खुद लेगा, किसी सुपरपावर के दबाव में आकर नहीं. जयशंकर कह रहे हैं कि अगर रूस से तेल खरीदना हमारे देश के हित में है, तो हम खरीदेंगे. हम किसी एक गुट (अमेरिका या रूस) के स्थायी पिछलग्गू नहीं बनेंगे.
अमेरिका आखिर क्या ‘खेल’ खेलने की कोशिश कर रहा था?
अमेरिका ने भारत के सामानों पर टैरिफ कम करके फायदा दिखाया, ताकि भारत रूस से तेल खरीदना बंद कर दे. अमेरिका का असली मकसद रूस की कमाई रोकना और भारत को पूरी तरह अपने पाले में लाना है.
वेनेजुएला का नाम अचानक चर्चा में क्यों आ गया?
अमेरिका ने वेनेजुएला के नेता निकोलस मादुरो को पकड़ लिया है और वहां की तेल इंडस्ट्री पर कब्जा कर लिया है. अब अमेरिका भारत से कह रहा है रूस को छोड़ो, हमसे (वेनेजुएला से) तेल लो. यह अमेरिका की एक सोची-समझी चाल है ताकि वह ग्लोबल ऑयल मार्केट का ‘कंट्रोलर’ बन सके.
क्या अमेरिका ने भारत को टैरिफ कम करके रिश्वत देने की कोशिश की?
इसे कूटनीतिक भाषा में लेन-देन कहते हैं. अमेरिका ने भारतीय उत्पादों पर टैरिफ 50% से घटाकर 18% कर दिया, जो एक बहुत बड़ी राहत है. इसके बदले में वह चाहता था कि भारत रूस को ‘बाय-बाय’ कह दे, लेकिन जयशंकर ने इस ‘डील’ को तेल से जोड़ने से इनकार कर दिया.
रूस ने इस पूरे मामले पर इतना ‘ठंडा’ जवाब क्यों दिया?
रूस ने बहुत समझदारी दिखाई. उसे पता है कि भारत एक बड़ी शक्ति है जिसे आदेश नहीं दिया जा सकता. रूस का यह कहना कि “भारत किसी से भी तेल खरीदने को आजाद है,” असल में अमेरिका को चिढ़ाने जैसा है. रूस दिखाना चाहता है कि वह अमेरिका की तरह अपने दोस्तों पर शर्तें नहीं थोपता.
क्या भारत अब रूस और वेनेजुएला दोनों से तेल खरीदेगा?
हां, भारत यही करेगा. भारत की नीति है ‘मल्टी-एलाइनमेंट’. हम रूस से भी तेल लेंगे क्योंकि वह पुराना दोस्त है और वेनेजुएला से भी लेंगे अगर अमेरिका वहां से सस्ता तेल उपलब्ध कराता है. भारत किसी एक पर निर्भरता नहीं चाहता.
’दिल्ली डिसाइड्स’ का संदेश दुनिया के लिए क्या है?
इसका मतलब है कि भारत के भविष्य और उसकी जरूरतों के फैसले वॉशिंगटन, लंदन या मॉस्को में नहीं, बल्कि दिल्ली में होते हैं. जयशंकर ने म्यूनिख में यह जतला दिया कि भारत अब ‘रूल टेकर’ यानी नियम मानने वाला नहीं, बल्कि ‘रूल मेकर’ यानी नियम बनाने वाला देश है.
क्या इस बयान से भारत-अमेरिका के रिश्तों में खटास आएगी?
नहीं, अमेरिका को पता है कि उसे चीन के खिलाफ भारत की जरूरत है. इसलिए वह दबाव तो बनाएगा, लेकिन रिश्तों को तोड़ेगा नहीं. जयशंकर इस ‘जरूरत’ को अच्छी तरह समझते हैं, इसीलिए वे इतनी बेबाकी से अपनी बात रख पाते हैं.
रूस का इस मामले में क्या रुख है
जहां एक तरफ अमेरिका भारत को रूस से दूर करने की कोशिश कर रहा है, वहीं रूस ने इस पर बहुत ही संतुलित प्रतिक्रिया दी है. क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेसकोव ने कहा, भारत किसी भी देश से तेल खरीदने के लिए स्वतंत्र है. रूस कभी भी भारत का एकमात्र सप्लायर नहीं रहा है, भारत पहले भी अन्य देशों से तेल खरीदता रहा है. इसमें कुछ भी नया नहीं है.

