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एक साथ चुनाव से बचेगा पैसा, जीडीपी को 1.5% तक फायदा: ‘वन नेशन वन इलेक्शन’ पर जजों की मुहर!


नई दिल्ली. देश में एक साथ चुनाव कराने के मुद्दे पर जजों और कानून विशेषज्ञों की बड़ी बैठक में ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ के पक्ष में मजबूत राय सामने आई है. सम्मेलन में कहा गया कि बार-बार चुनाव होने से सरकारी पैसा, सुरक्षा बल और प्रशासनिक मशीनरी पर भारी बोझ पड़ता है. अगर लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ हों, तो शासन ज्यादा स्थिर होगा और विकास पर ज्यादा ध्यान दिया जा सकेगा.

इलाहाबाद हाईकोर्ट के पूर्व जज भंवर सिंह ने कहा कि 1967 के बाद से चुनावों में हिंसा और खर्च दोनों बढ़े हैं. उन्होंने बताया कि हर बार चुनाव में करोड़ों रुपये खर्च होते हैं और बड़ी संख्या में सुरक्षाबल तैनात करने पड़ते हैं. ये संसाधन अगर विकास कार्यों में लगें, तो देश को बड़ा फायदा हो सकता है. उन्होंने जर्मनी और नेपाल जैसे देशों का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां एक साथ चुनाव से वोटिंग प्रतिशत और गवर्नेंस बेहतर हुआ है.

पूर्व जज जेड यू खान ने कहा कि सैद्धांतिक रूप में यह विचार सही है, क्योंकि इससे नीति में निरंतरता आएगी और प्रशासनिक संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल होगा. हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि संघीय ढांचे (फेडरलिज़्म), राज्यों की चिंताओं और राजनीतिक जवाबदेही का पूरा ध्यान रखना जरूरी है.

उत्तराखंड हाईकोर्ट के पूर्व जज विवेक भारती ने कहा कि लोगों की आशंकाएं गलत हैं. भारत में 1952 से 1967 तक एक साथ चुनाव होते थे, जो पूरी तरह संवैधानिक प्रक्रिया थी. उन्होंने बताया कि बार-बार चुनाव से न्यायपालिका, पुलिस और प्रशासन पर बेवजह दबाव बढ़ता है. एक साथ चुनाव से यह दबाव कम होगा.

प्रसिद्ध कानूनविद और चार्टर्ड अकाउंटेंट रवि शंकर पाणी ने कहा कि बार-बार चुनाव से देश की अर्थव्यवस्था भी प्रभावित होती है. मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट लगते ही कई विकास और आर्थिक गतिविधियां रुक जाती हैं. अगर चुनाव एक साथ हों, तो देश को आर्थिक स्थिरता और फिस्कल बचत मिलेगी.

पूर्व जज लोकपाल सिंह ने शिक्षा पर पड़ने वाले असर की ओर ध्यान दिलाया. उन्होंने कहा कि चुनाव के समय बड़ी संख्या में शिक्षकों को ड्यूटी में लगा दिया जाता है, जिससे बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होती है. उन्होंने सुझाव दिया कि अगर तीनों स्तरों पर एक साथ चुनाव अभी संभव न हों, तो कम से कम लोकसभा और विधानसभा के चुनाव पहले साथ कराए जाएं.

भारत के पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा ने चुनाव आयोग के नजरिए से बात रखते हुए कहा कि इस प्रस्ताव पर गंभीर और व्यवस्थित तरीके से विचार करने की जरूरत है, ताकि हर पहलू को ठीक से समझा जा सके.

सम्मेलन के मुख्य अतिथि केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने कहा कि “वन नेशन, वन इलेक्शन” पर विचार 1983 से चल रहा है. उन्होंने बताया कि इस पर चुनाव आयोग, विधि आयोग, संसदीय समितियों और नीति आयोग ने भी रिपोर्ट दी हैं. 2019-20 में राजनीतिक दलों से भी चर्चा हुई थी और रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता वाली हाई-लेवल कमेटी ने भी इसका समर्थन किया है. कानून मंत्री ने कहा कि अध्ययनों के मुताबिक अगर यह व्यवस्था लागू होती है तो जीडीपी में करीब 1.5 फीसदी तक का फायदा हो सकता है. इससे देश की आर्थिक ताकत बढ़ेगी और भारत को वैश्विक स्तर पर और मजबूती मिलेगी.

लंबी चर्चा के बाद सम्मेलन में सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित किया गया, जिसमें ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ का सिद्धांत रूप में समर्थन किया गया. साथ ही यह भी कहा गया कि इसे संविधान के दायरे में रहते हुए, चरणबद्ध और सभी से सलाह लेकर लागू किया जाना चाहिए, ताकि संघीय ढांचे, लोकतंत्र और चुनावी प्रक्रिया की पवित्रता बनी रहे.

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