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सत्ता के दरवाजे खुले थे, मगर कोई घुस न सका… 2005 का वो ‘क्लिक प्वॉइंट’ जिसने लालू-राबड़ी राज का अंत कर दिया?


पटना. बिहार की राजनीति में 2005 सिर्फ चुनावी साल नहीं था, बल्कि सत्ता परिवर्तन की पटकथा लिखने वाला महत्वपूर्ण वर्ष था. यह वही वर्ष था जिसने कुछ ऐसा टर्निंग प्वाइंट दिया कि बीते दो दशक से मौटे तौर (बीच में कुछ महीनों को छोड़कर) पर लालू परिवार बिहार की सत्ता से दूर ही रहा है. 1990 से 2005 तक लगातार चलता आ रहा लालू-रबड़ी के शासन का दौर अचानक खत्म नहीं हुआ था, बल्कि उसे तोड़ा एक राजनीतिक ठहराव ने. इस राजनीतिक घटनाक्रम का असली ‘क्लिक प्वॉइंट’ था फरवरी 2005 का अधूरा जनादेश और उसके बाद लिया गया एक रणनीतिक फैसला.

15 साल का शासन, जनता में बदलाव का मन

बता दें कि वर्ष 1990 से 2005 तक बिहार की राजनीति पर लालू प्रसाद यादव और बाद में राबड़ी देवी का नियंत्रण रहा. सामाजिक न्याय की राजनीति ने उन्हें मजबूत आधार दिया, लेकिन समय के साथ विकास, कानून व्यवस्था और भ्रष्टाचार के सवाल भारी पड़ने लगे. बिहार की जनता के एक बहुत बड़े वर्ग में बदलाव की इच्छा दिखने लगी थी. फिर आया 2005 का चुनावी साल और फरवरी का महीना जब बिहार के लोगों ने बदलाव की इच्छा का संकेत तो दिया, लेकिन ऐसा लगा कि शायद यह पूरे मन से नहीं था.

सबसे बड़ी पार्टी, लेकिन सत्ता नहीं मिल पाई

दरअसल, फरवरी 2005 विधानसभा चुनाव में उस समय यूपीए की तीन पार्टियां अलग-अलग लड़ीं- राजद, कांग्रेस और रामविलास पासवान की लोजपा (एलजेपी). राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) 75 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी. कांग्रेस को 10 सीटें मिली थीं. जबकि, नीतीश कुमार की जदयू और भाजपा के गठबंधन एनडीए को 92 सीटें मिलीं. 243 सदस्यीय विधानसभा में बहुमत का आंकड़ा 122 था. ऐसे में सियासी तस्वीर साफ थी कि कोई भी दल या गठबंधन अपने दम पर सरकार नहीं बना सकता था. यहां तीसरी ताकत के रूप में उभरी लोक जनशक्ति पार्टी, जिसे 29 सीटें मिलीं. यही वो समय था जब लोजपा के नेता रामविलास पासवान अचानक किंगमेकर बन गए थे.

नेता का इनकार, परिवर्तन का ‘क्लिक प्वॉइंट’

यही वह क्षण था जिसने बिहार की राजनीति और लालू-राबड़ी शासनकाल का इतिहास मोड़ दिया. रामविलास पासवान ने साफ कहा कि वे न भाजपा के साथ जाएंगे और न ही राजद के साथ. उन्होंने राजद पर भ्रष्टाचार और जातिवादी राजनीति का आरोप लगाया और समर्थन से साफ इनकार कर दिया. राजद के पास संख्या तो थी, लेकिन बहुमत के लायक समर्थन नहीं था. एनडीए के पास गठबंधन था, लेकिन इस पक्ष के पास भी बहुमत का आंकड़ा नहीं था. ऐसे में सदन त्रिशंकु की स्थिति में लटक गया, ऐसे में यही था असली ‘क्लिक प्वॉइंट’. दरअसल, सत्ता के दरवाजे तो खुले थे, लेकिन कोई अंदर नहीं जा सका था.

लालू यादव सरकार बनाने के लिए रामविलास पासवान का समर्थन चाहते थे. लेकिन, लोजपा नेता ने साफ मना कर दिया और कहा- न तो सांप्रदायिक भाजपा के साथ जाऊंगा और न ही भ्रष्ट और जातिवादी राजद के साथ. फरवरी 2005 में कोई भी सरकार नहीं बन पाई और राष्ट्रपति शासन लागू हुआ.

बिहार विधानसभा भंग, राष्ट्रपति शासन लागू

सरकार बनाने की कवायद की गई, राजनीतिक जोड़तोड़ की कोशिशें हुईं, आरोप-प्रत्यारोप के दौर चले , मगर सत्ता के लिए बहुमत का आंकड़ा किसी भी पक्ष के पास नहीं आ पाया. ऐसे में तत्कालीन राज्यपाल बूटा सिंह ने विधानसभा भंग कर दी और बिहार में राष्ट्रपति शासन लगा दिया. रामविलास पासवान की नीति ने लालू राज को बिहार से खत्म करने का रास्ता साफ कर दिया और बिहार फिर विधानसभा चुनाव की ओर बढ़ चला. फरवरी का अधूरा जनादेश दरअसल राजद के खिलाफ माहौल को और मजबूत कर गया. जनता को लगा कि स्थिर सरकार के लिए नया विकल्प चाहिए और यहां वह ‘पॉलिटिकल टर्निंग प्वाइंट’ आ गया जब बिहार में बदलाव की बयार बहने लगी.

अक्टूबर-नवंबर 2005, बदलाव की लहर

फरवरी के चुनाव के बाद बिहार के लोगों को लगने लगा कि लालू यादव का दौर खत्म होना चाहिए. नीतीश कुमार की जदयू ने सुशासन और विकास का नारा दिया और भाजपा के साथ उनका गठबंधन मजबूत हुआ. रामविलास पासवान की लोजपा ने राजद को नुकसान पहुंचाया क्योंकि दलित वोट बंट गया.फिर नवंबर में नए चुनाव हुए और इस बार एनडीए ने धमाल मचा दिया. जदयू सबसे बड़ी पार्टी बनी और एनडीए को स्पष्ट बहुमत मिला. नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने. राजद सिर्फ 54 सीटें जीत पाई और लालू-राबड़ी का 15 साल का शासन खत्म हो गया. बिहार में नया दौर शुरू हुआ- सड़कें बनीं, अपराध कम हुआ, विकास की बात चली.

बिहार 2005: रामविलास पासवान के समर्थन नहीं देने से 1990 से 2005 तक चले लालू-राबड़ी शासनकाल का अंत हो गया. इसके बाद बिहार के लोगों में बदलाव और विकल्प की बातें उभरने लगी और नीतीश कुमार के नेतृत्व में एनडीए ने अक्टूबर-नवबर 2005 के चुनाव में जीत प्राप्त की.

क्यों निर्णायक था वर्ष 2005 का वह फैसला?

साफ है कि 2005 में रामविलास पासवान का किसी भी गठबंधन को समर्थन नहीं देने का फैसला लालू राज के अंत का ‘ट्रिगर प्वाइंट’ बन चुका था. यहीं 15 साल का दौर समाप्त हुआ. क्लिक प्वॉइंट सिर्फ रामविलास पासवान का अलग होना भर नहीं था, बल्कि उस राजनीतिक-सामाजिक आधार के संतुलन का टूटना था जिसके भरोसे लालू यादव सत्ता पर पकड़ मजबूत रखे हुए थे. दरअसल, यूपीए घटक दल अलग-अलग लड़े तो दलित और मुस्लिम वोटों का समीकरण बिखर गया. राजद सबसे बड़ी पार्टी होकर भी सरकार नहीं बना सका. इसके बाद से ही जनता के मन और विचार में स्थिर विकल्प की तलाश तेज हुई. अगर फरवरी 2005 में राजद सरकार बना लेता, तो शायद कहानी अलग होती. लेकिन, सत्ता का वह दरवाजा बंद रह गया और लालू-राबड़ी शासनकाल का अंत हो गया.

पूरी राजनीतिक मशीनरी की दिशा बदल गई

आज भी 2005 बिहार की सियासत में याद किया जाता है, क्योंकि यहीं से सुशासन का नया अध्याय शुरू हुआ. 2005 में बिहार में बदलाव एक दिन में नहीं आया. फरवरी का अधूरा जनादेश और रामविलास पासवान का समर्थन न देने का फैसला वह बटन था, जिसने पूरी राजनीतिक मशीनरी की दिशा बदल दी. एक नेता का निर्णय, एक लटका हुआ सदन और दोबारा चुनाव. अक्टूबर में नीतीश की लहर चली और रामविलास पासवान के एक निर्णय ने इतिहास बदल दिया. यही था वह क्लिक प्वॉइंट, जिसने 15 साल पुराना सत्ता संतुलन उलट दिया और बिहार की राजनीति को नए दौर में ले आया.

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